सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 यानी SC/ST एक्ट को लेकर अहम फैसला दिया है। अदालत ने साफ कहा कि इस कानून की धारा 18 अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर पूरी तरह रोक लगाती है। यानी यदि किसी व्यक्ति पर इस कानून के तहत आरोप तय होता है तो वह सामान्य परिस्थितियों में गिरफ्तारी से पहले जमानत नहीं ले सकता। हालांकि कोर्ट ने एक अपवाद जोड़ा—अगर एफआईआर में पहली नजर में (Prima Facie) ही अपराध बनता नहीं दिख रहा, तभी आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी इसलिए की ताकि संविधान द्वारा दलितों और आदिवासियों को दी गई सुरक्षा कमजोर न हो। अदालत ने कहा कि यदि बिना जांच-परख के आसानी से अग्रिम जमानत मिलने लगेगी, तो इस वर्ग की संवैधानिक गारंटी खतरे में पड़ सकती है। कोर्ट ने 2018 की उस घटना का भी जिक्र किया जब इसके फैसले के बाद दलित संगठनों ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किए थे, जो कई जगह हिंसक भी हुए थे। बाद में केंद्र सरकार ने संशोधन कर कोर्ट के फैसले को पलटा था और कानून को और सख्त बनाया था।
दरअसल, SC/ST एक्ट का मूल उद्देश्य है अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सामाजिक न्याय, सम्मान और सुरक्षा दिलाना। सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला इस बात पर जोर देता है कि इस कानून की ताकत बनी रहनी चाहिए, ताकि कमजोर वर्गों को न्याय मिल सके। अब अग्रिम जमानत केवल तभी मिलेगी जब शिकायत में ही अपराध का कोई ठोस आधार न हो।













