हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
भरण-पोषण बढ़ाने का आदेश सही ठहराया
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पत्नी को पति की कुल कमाई का 25 प्रतिशत तक गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियां बदलती हैं और महंगाई बढ़ती है, तो भरण-पोषण की राशि में वृद्धि करना कानूनन उचित है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया।
500 से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह किया गया भत्ता
मामले में याचिकाकर्ता ने अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर के 26 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 127 के तहत पत्नी को दिए जाने वाले भरण-पोषण भत्ते को 500 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि न तो अत्यधिक है और न ही पति की आय से परे मानी जा सकती है।
पति की दलीलें खारिज
याचिकाकर्ता सुरेश चंद्र की ओर से दलील दी गई कि वह एक मजदूर है और सीमित आय में मुश्किल से जीवन यापन करता है। यह भी कहा गया कि भरण-पोषण की राशि में बार-बार वृद्धि अनुचित है। हालांकि अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने सभी तथ्यों पर समुचित विचार करने के बाद ही राशि बढ़ाई है और इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
सेवा लाभ में भेदभाव नहीं कर सकता राज्य
इसी क्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में यह भी कहा कि पीसीएस से आईएएस कैडर में प्रोन्नत अधिकारियों को सेवा लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बादल चटर्जी और शंकर सिंह को निर्देश दिया कि उन्हें वही प्रोन्नत वेतनमान दिया जाए, जो उनके बैच के उन अधिकारियों को मिला है, जिन्हें आईएएस में प्रोन्नति नहीं मिली। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पीपीएस से आईपीएस में प्रोन्नत अधिकारी राजेश श्रीवास्तव को बढ़े वेतनमान का लाभ दिया गया है, तो याचियों से भेदभाव नहीं किया जा सकता।
न्याय और समानता पर जोर
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, चाहे वह पारिवारिक मामलों में हो या सेवा संबंधी विवादों में। किसी भी स्थिति में समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।













