हिन्दुस्तान मिरर न्यूज, 12-7-2025
उत्तर प्रदेश शासन ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 113 के संभावित दुरुपयोग को रोकने हेतु स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस धारा के तहत केवल उन्हीं मामलों में कार्रवाई की जाएगी, जिनमें आरोपित की गतिविधियां देश की एकता, संप्रभुता और सुरक्षा के प्रत्यक्ष विरुद्ध हों। शासन ने कहा है कि सरकार की आलोचना, नीतियों का विरोध या सामाजिक आंदोलनों में भाग लेना किसी भी स्थिति में आतंकवाद की श्रेणी में नहीं आता।
शासन द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, किसी भी मामले में मुकदमा दर्ज करने से पहले पुलिस अधीक्षक (एसपी) स्तर के अधिकारी द्वारा समुचित साक्ष्य संकलन, तथ्यों का गहन विश्लेषण तथा प्रमाणिकता की जांच करना अनिवार्य होगा। केवल संदेह, अनुमान या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इसके अतिरिक्त, प्रत्येक पंजीकृत मामले की समीक्षा जिला मजिस्ट्रेट एवं जनपदीय पुलिस प्रमुख की निगरानी समिति द्वारा की जाएगी और उसकी रिपोर्ट राज्य गृह विभाग को भेजी जाएगी।
न्यायिक प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य होगा, जिसमें आरोपी को विधिक सहायता, निष्पक्ष सुनवाई और बचाव का पूरा अवसर दिया जाएगा। साथ ही सभी पुलिस इकाइयों एवं अभियोजन अधिकारियों को धारा 113 की व्याख्या, दायरा और प्रक्रिया की नियमित प्रशिक्षण व मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।
गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद ने स्पष्ट किया कि यह धारा केवल उन्हीं कार्यों पर लागू होगी जो वाकई देश में भय, हिंसा, अराजकता फैलाने या सरकार को निर्णयों से रोकने हेतु हिंसक धमकियों का सहारा लेते हैं। इस धारा के तहत दोष सिद्ध होने पर मृत्युदंड या उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन यह धारा लोकतांत्रिक अधिकारों को बाधित करने का उपकरण नहीं बनेगी।
इस दिशा में एक और कदम उठाते हुए डीजीपी राजीव कृष्ण ने भी चेतावनी दी कि समाप्त हो चुके कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज करने की पुनरावृत्ति पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह निर्देश प्रयागराज में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 1998 के तहत दर्ज एक पुराने मामले के संदर्भ में जारी किया गया है, जिसे वर्ष 2024 में निरस्त किया जा चुका है।
शासन ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि धारा 113 का प्रयोग केवल सत्य, साक्ष्य आधारित और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत हो, और असहमति या आलोचना को आतंकवाद जैसा न माना जाए।