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भारत–EU की ‘मदर्स ऑफ ऑल डील’: अमेरिका में क्यों मची खलबली, भारतीयों को क्या होगा फायदा

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए बहुप्रतीक्षित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को ‘मदर्स ऑफ ऑल डील’ कहा जा रहा है। करीब नौ साल के लंबे अंतराल के बाद जून 2022 में शुरू हुई बातचीत अब अपने निर्णायक मुकाम पर पहुंच गई है। मंगलवार को इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसने वैश्विक राजनीति और व्यापार जगत में हलचल पैदा कर दी है।

डील इतनी अहम क्यों है?

यह समझौता भारत और EU के बीच अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक करार माना जा रहा है। साल 2023-24 में भारत और EU के बीच करीब 135 बिलियन डॉलर का व्यापार हुआ था। FTA लागू होने के बाद यह आंकड़ा और तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है। इस डील से 1.9 बिलियन से अधिक उपभोक्ताओं का साझा बाजार तैयार होगा, जो वैश्विक GDP के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगा।

इस करार के तहत यूरोप से भारत आने वाले करीब 97 फीसदी उत्पादों पर टैरिफ कम या समाप्त हो जाएंगे। इससे व्यापार ऐसे समय में बढ़ेगा, जब भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव को कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

अमेरिका क्यों असहज है?

भारत–EU समझौते के बाद अमेरिका की चिंता साफ नजर आने लगी है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने फिर आरोप दोहराया कि रूस से भारत का तेल आयात यूक्रेन-रूस युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंड करता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान भारत–EU की बढ़ती नजदीकी और अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश का संकेत है।

किन सेक्टर्स को मिलेगा फायदा

FTA से टेक्सटाइल, लेदर, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स और ज्वेलरी जैसे भारतीय सेक्टर्स को बड़ा लाभ मिलेगा। ये सेक्टर यूरोपीय मैन्युफैक्चरर्स से सीधे मुकाबले में नहीं हैं। साथ ही, भारत के एक्सपोर्टर्स को बांग्लादेश जैसे देशों से मिलने वाली ड्यूटी-फ्री प्रतिस्पर्धा का सामना करने में भी राहत मिलेगी।

भारतीयों के लिए क्या होगा सस्ता

इस समझौते के तहत 96.6 फीसदी यूरोपीय उत्पादों पर टैरिफ खत्म या कम होंगे। इससे यूरोपियन कारों पर टैक्स 110 फीसदी से घटकर सिर्फ 10 फीसदी रह जाएगा। वाइन पर ड्यूटी 150 फीसदी से घटकर 20 फीसदी तक आ जाएगी। वहीं, पास्ता और चॉकलेट जैसे प्रोसेस्ड फूड, जिन पर अभी 50 फीसदी टैरिफ है, पूरी तरह सस्ते हो जाएंगे।

ट्रंप टैरिफ का रणनीतिक जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच साझेदारी का आदर्श उदाहरण बताया। यह समझौता डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें भारत और EU दोनों निशाने पर थे।

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