हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
1996 के मामले में निचली अदालत की सजा रद्द
गुजरात हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने व्यापक बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा कि पति द्वारा पत्नी को मारा गया एक थप्पड़ अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह टिप्पणी 1996 के एक मामले में अपील की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को रद्द कर दिया गया।
मामले में दिलीपभाई मंगलाभाई वरली को सेशंस कोर्ट ने वर्ष 2003 में आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) का दोषी ठहराते हुए सात वर्ष की सजा सुनाई थी। उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप
महिला पक्ष का आरोप था कि पति आए दिन पत्नी को परेशान करता था और उसके साथ मारपीट करता था, जिससे तंग आकर महिला ने आत्महत्या कर ली। यह भी कहा गया कि पति रात में आय बढ़ाने के लिए बैंजो बजाने जाता था, जिसे पत्नी पसंद नहीं करती थी और इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद होते थे।
अदालत की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गीता गोपी ने कहा कि ‘क्रूरता’ साबित करने के लिए लगातार और असहनीय शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न के ठोस और विश्वसनीय सबूत आवश्यक हैं। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि आरोपी ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया या उसके साथ निरंतर क्रूरता की।
एक थप्पड़ की घटना पर निर्णय
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पत्नी बिना बताए मायके चली गई थी, जिससे क्षुब्ध होकर उसने एक थप्पड़ मारा था। अदालत ने इसे एक अलग-थलग घटना मानते हुए कहा कि इसे स्वतः ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने कानूनी और सामाजिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।
#GujaratHighCourt #DomesticViolenceLaw #Section306IPC #CrueltyLaw #IndianJudiciary













