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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज में बढ़ती उस खतरनाक मानसिकता पर कड़ी टिप्पणी की है, जिसमें लोग यह मानने लगे हैं कि रिश्वत देकर शैक्षणिक डिग्री और नौकरी तक हासिल की जा सकती है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने फर्जी पीएचडी डिग्री और असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी दिलाने के नाम पर हुई ठगी के मामले में दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया।
ठगी का मामला क्या है
कानपुर निवासी तान्या दीक्षित ने आरोप लगाया कि प्रियंका सिंह सेंगर व अन्य आरोपियों ने उसे अलीगढ़ के एक विश्वविद्यालय में पीएचडी में प्रवेश और कानपुर के एक विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी दिलाने का झांसा दिया। इस पर विश्वास कर पीड़िता और उसकी मां ने आरोपियों के खातों में 22.18 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।
फर्जी दस्तावेजों से हुआ खुलासा
पीड़िता ने न तो किसी कोर्स में आवेदन किया और न ही भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया, फिर भी उसे पीएचडी मार्कशीट, एडमिशन लेटर और नियुक्ति पत्र जैसे दस्तावेज दिए गए। विश्वविद्यालय पहुंचने पर रजिस्ट्रार ने सभी दस्तावेजों को फर्जी और हस्ताक्षर नकली बताया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला समाज में गिरते नैतिक मूल्यों को दर्शाता है। एक शिक्षित महिला का इस तरह ठगी का शिकार होना गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे अपराधों को सख्ती से दंडित करना जरूरी है ताकि समाज में नैतिकता बनी रहे।
आरोपियों की दलील खारिज
आरोपी पक्ष ने सह-आरोपियों को मिली राहत के आधार पर एफआईआर रद्द करने की मांग की, जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
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