हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
औपनिवेशिक परंपरा से प्रशासनिक सुधार तक, बजट के बदलते स्वरूप की पूरी कहानी
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को सुबह 11 बजे लोकसभा में भारत का यूनियन बजट 2026-27 पेश करेंगी। यह मोदी सरकार 3.0 का तीसरा पूर्ण बजट और निर्मला सीतारमण का लगातार नौवां बजट होगा। आज बजट का यह समय और तारीख हमें सामान्य लगते हैं, लेकिन इसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक, प्रशासनिक और प्रतीकात्मक सफर छिपा है। कभी बजट हर साल 28 फरवरी को शाम 5 बजे पेश होता था। फिर यह परंपरा बदली—और यह बदलाव सिर्फ घड़ी या कैलेंडर का नहीं, बल्कि सोच और शासन प्रणाली का भी था।
ब्रिटिश काल की विरासत: शाम 5 बजे क्यों होता था बजट?
भारत में बजट को शाम 5 बजे पेश करने की परंपरा ब्रिटिश शासन के समय शुरू हुई थी। आजादी से पहले और आजादी के बाद भी लंबे समय तक—लगभग 1999 तक—केंद्रीय बजट इसी समय पेश होता रहा।
उस दौर में भारत और ब्रिटेन के बीच करीब 4 घंटे 30 मिनट का समय अंतर था। जब भारत में शाम के 5 बजते थे, तब लंदन में सुबह 11:30 बजे होते थे। इससे ब्रिटिश सरकार और अधिकारी भारत के बजट दस्तावेजों को तुरंत देख सकते थे और अपने हितों से जुड़े फैसले ले सकते थे। यह व्यवस्था भारत की आर्थिक नीतियों को ब्रिटिश प्रशासनिक जरूरतों से जोड़कर रखती थी।
आजादी के बाद भी यह परंपरा चलती रही, क्योंकि शुरुआती दशकों में प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव की प्राथमिकता नहीं बन पाई। लेकिन समय के साथ यह महसूस होने लगा कि यह व्यवस्था स्वतंत्र भारत की जरूरतों के अनुरूप नहीं है।
1999 का ऐतिहासिक फैसला: सुबह 11 बजे का दौर शुरू
वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने पहली बार बजट सुबह 11 बजे पेश किया। यह बदलाव 27 फरवरी 1999 को हुआ और इसके साथ ही दशकों पुरानी औपनिवेशिक परंपरा टूट गई।
इस फैसले के पीछे स्पष्ट सोच थी। भारत अब ब्रिटेन का उपनिवेश नहीं था, इसलिए लंदन के समय के हिसाब से बजट पेश करने की कोई जरूरत नहीं थी। सुबह 11 बजे बजट पेश करने से सांसदों, अधिकारियों और मीडिया को पूरे दिन बजट पर चर्चा, विश्लेषण और बहस का समय मिल गया। पहले शाम 5 बजे बजट आने के बाद गंभीर चर्चा रात तक सीमित रह जाती थी।
यह बदलाव सिर्फ समय का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी भारत का प्रतीक बन गया।
2017 का बड़ा बदलाव: 28 फरवरी से 1 फरवरी
एक और बड़ा सुधार 2017 में हुआ, जब मोदी सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट की तारीख 28 फरवरी से बदलकर 1 फरवरी कर दी। पहली बार 1 फरवरी 2017 को बजट पेश किया गया।
इसके पीछे मुख्य कारण प्रशासनिक और व्यावहारिक थे। भारत का वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होता है। अगर बजट फरवरी के आखिर में पेश होता, तो संसद में चर्चा, पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रक्रिया में मार्च का पूरा महीना निकल जाता था। इससे नई योजनाओं और टैक्स बदलावों को लागू करने में देरी होती थी।
कई बार सरकार को ‘वोट ऑन अकाउंट’ लेना पड़ता था, जिसमें केवल जरूरी खर्चों की अनुमति मिलती थी और नई योजनाएं शुरू नहीं हो पाती थीं।
1 फरवरी के फायदे: समय पर विकास की रफ्तार
1 फरवरी को बजट पेश करने से सरकार को फरवरी और मार्च—दो महीने का अतिरिक्त समय मिल जाता है। इससे संसद में पूरी प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती है। मंत्रालय और विभाग नए वित्तीय वर्ष से पहले अपने खर्च और योजनाओं की बेहतर तैयारी कर पाते हैं।
राज्य सरकारों को भी पहले से पता चल जाता है कि उन्हें केंद्र से कितना फंड मिलेगा, जिससे वे अपनी योजनाएं समय पर बना सकती हैं। नतीजतन विकास कार्यों में तेजी आती है और प्रशासनिक देरी कम होती है। यही वजह है कि 2017 से यह व्यवस्था स्थायी कर दी गई।
रेल बजट का विलय: एक और सुधार
2017 में ही एक और अहम बदलाव हुआ। पहले रेल बजट अलग से पेश किया जाता था, लेकिन इसे आम बजट में मिला दिया गया। इससे संसदीय प्रक्रिया सरल हुई, समय की बचत हुई और रेलवे को समग्र आर्थिक नीति का हिस्सा बनाया गया।
बजट 2026: आधुनिक भारत की तस्वीर
1 फरवरी 2026 को सुबह 11 बजे पेश होने वाला यूनियन बजट 2026-27 अब एक स्थापित परंपरा का हिस्सा है। यह समय और तारीख उस भारत को दर्शाते हैं, जो औपनिवेशिक विरासत से मुक्त होकर व्यावहारिक, कुशल और विकास-उन्मुख फैसले ले रहा है।
यह बदलाव सिर्फ तारीख और घड़ी का नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है, जिसमें भारत अपनी आर्थिक प्रक्रियाओं को अपने हितों के अनुसार ढाल रहा है। यही आत्मनिर्भर भारत की असली कहानी है।













