हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि कंपनी के दिवालिया होने से कर्मचारी का हक खत्म नहीं होता। यह मामला श्री राव नामक कर्मचारी से जुड़ा है, जिन्होंने 23 अक्टूबर 1999 को एक कंपनी में कस्टमर सर्विस असिस्टेंट के रूप में काम शुरू किया था। छह महीने के प्रोबेशन के बाद उनकी नौकरी पक्की हो गई। कई सालों तक वे बेंगलुरु शाखा में काम करते रहे, लेकिन 2008 में एक घटना के बाद कंपनी ने उन्हें ‘कदाचार’ (misconduct) के आरोप में बर्खास्त कर दिया।
राव ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला सेंट्रल गवर्नमेंट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट में पहुंचा। कई वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद 13 जनवरी 2017 को कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कंपनी द्वारा की गई जांच प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी और आरोप साबित नहीं हुए। लेबर कोर्ट ने राव की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए उनकी नौकरी बहाल करने और 50% बकाया वेतन देने का आदेश दिया।
इस बीच कंपनी ने अपील की, लेकिन अदालत ने 20 अप्रैल 2017 को आदेश दिया कि कंपनी 13 लाख रुपये (50% बैक वेज की अनुमानित रकम) अदालत में जमा करे। बाद में कंपनी दिवालिया घोषित हो गई और लिक्विडेशन प्रक्रिया में चली गई। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने 25 सितंबर 2025 को अपने फैसले में कहा कि राव का हक 2017 में तय हो चुका था, इसलिए दिवालियापन का असर उस पर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि कंपनी अब बंद हो चुकी है, इसलिए नौकरी पर बहाली का आदेश लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन आर्थिक मुआवजा देना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कंपनी की रिट याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया कि अदालत में जमा 13 लाख रुपये और उस पर अर्जित ब्याज तुरंत राव को जारी किया जाए। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए मिसाल है जो गलत टर्मिनेशन के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं













