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अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में सोशल मीडिया का दुरुपयोग फैशन बन गया है” – इलाहाबाद हाई कोर्ट

हिन्दुस्तान मिरर | 3 जुलाई 2025

प्रयागराज (विधि संवाददाता, हिन्दुस्तान मिरर):
सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भारतीय सेना के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट डालने वाले युवक की जमानत याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सख्ती से खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति राष्ट्र के सम्मान, उसकी एकता, और सुरक्षा बलों की गरिमा को ठेस पहुँचाए।”

कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा कि “सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर देश विरोधी भावनाएं फैलाना अब कुछ लोगों के लिए ‘फैशन’ बन गया है। यह अत्यंत चिंताजनक प्रवृत्ति है, जो समाज और राष्ट्र दोनों के लिए खतरा है।”

हाथरस के सासनी थाने में दर्ज एफआईआर के अनुसार आरोपी अशरफ खान उर्फ निसरत पर भारतीय दंड संहिता (बीएनएस) की धारा 152 और 197 के तहत मामला दर्ज किया गया है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक आरोपी ने भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के संदर्भ में अपने फेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें भारतीय वायुसेना के विमान को पाकिस्तानी विमान से गिराया जाता हुआ दिखाया गया था। साथ ही उसने “पाकिस्तान वायु सेना जिंदाबाद” जैसी टिप्पणियां भी पोस्ट की थीं।

इतना ही नहीं, आरोपी द्वारा प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री पर भी कई आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट की गईं थीं। इन पोस्ट्स ने समाज में वैमनस्य और घृणा फैलाने का कार्य किया, जिसे अदालत ने “राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा के विरुद्ध गंभीर अपराध” माना।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ नहीं ली जा सकती। “देश विरोधी मानसिकता और राष्ट्रविरोधी प्रचार किसी भी रूप में सहन नहीं किया जाएगा।” न्यायालय ने कहा कि यदि इस प्रकार की पोस्ट्स को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाए तो इससे लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों पर गहरा संकट उत्पन्न हो सकता है।

न्यायालय के इस सख्त रुख से यह संदेश गया है कि सोशल मीडिया की आज़ादी का दुरुपयोग कर देशद्रोही भावना फैलाने वालों के प्रति सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह मामला न केवल साइबर अपराध की गंभीरता को उजागर करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि न्यायपालिका इस प्रकार के मामलों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगी।

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