एएमयू की रणनीतिक और सुरक्षा अध्ययन विभाग द्वारा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन
अलीगढ़, 30 सितंबरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संकाय के रणनीतिक और सुरक्षा अध्ययन विभाग ने स्पार्क, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत “शांति के स्थानीय मूल्यः महिलाएँ और शांतिपूर्ण समुदायों के निर्माण में उनकी भूमिका – जम्मू और कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत और उससे आगे” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया।
सामाजिक विज्ञान संकाय के कांफ्रेंस हॉल में आयोजित उद्घाटन सत्र की शुरुआत प्रो. आफताब आलम, डीन, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संकाय द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुई।
एएमयू की कुलपति प्रो. नइमा खातून ने अपने संबोधन में शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं के योगदान को मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने संघर्ष समाधान में महिलाओं की भूमिका, बाधाओं को दूर करने और जन समुदाय में उनके नेतृत्व को सशक्त बनाने पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही उन्होंने स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत सहयोग में महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता पर भी बल दिया।
मुख्य वक्ता, डॉ. श्वेता सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली ने वैश्विक उदाहरणों के माध्यम से शांति के राजनीतिक क्षेत्रों का विस्तार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका विचार था कि शांति की तलाश के बजाय प्रतिरोध के पहलुओं को समझना जरूरी है।
सम्मानित अतिथि राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. मिर्जा असमर बेग ने बदलती दुनिया में पोस्ट-ट्रुथ और मर्दानगी की अवधारणा पर चर्चा की, जिसमें महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में आने की आवश्यकता है।
उद्घाटन कार्यक्रम में प्रो. स्वाति पराशर, यूनिवर्सिटी ऑफ गोटेनबर्ग, यू.के. द्वारा वर्चुअल व्याख्यान दिया। उन्होंने शांति अध्ययन को सांस्कृतिक, धार्मिक और पौराणिक संदर्भों से जोड़कर गहराई प्रदान की। उन्होंने स्थानीय प्रतिरोध, क्षेत्रीय नारीवाद और महिलाओं के जीवन अनुभवों जैसे विषयों को भी उजागर किया।
सम्मेलन में प्रस्तुत विषयों में संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं की जमीनी शांति प्रथाएँ, लिंग-संवेदनशील आपदा शासन, शांति के स्वदेशी मूल्य और दक्षिण एशिया तथा लैटिन अमेरिका से तुलनात्मक अनुभव शामिल थे।
इससे पूर्व डॉ. सैयद तहसीन रजा, असिस्टेंट प्रोफेसर, रणनीतिक और सुरक्षा अध्ययन विभाग और स्पार्क परियोजना के प्रधान अन्वेषक ने दर्शकों को परियोजना के उद्देश्यों से परिचित कराया, विशेष रूप से संघर्ष क्षेत्रों में शांति निर्माता के रूप में महिलाओं के योगदान को पहचानने और दिखाने पर बल दिया।
डॉ. अन्दलीब, असिस्टेंट प्रोफेसर, सामाजिक कार्य विभाग ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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एएमयू के भौतिकी के विद्यार्थियों ने नरौरा परमाणु ऊर्जा संयंत्र का दौरा किया
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के एम.एससी. अंतिम वर्ष के 45 विद्यार्थियों ने नरौरा स्थित गंगा तट पर बने नरौरा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (एनएपीपी) का शैक्षणिक दौरा किया। इस दौरे का उद्देश्य विद्यार्थियों को परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी की व्यावहारिक जानकारी देना था।
नरौरा संयंत्र, जिसमें दो 220 मेगावाट के रिएक्टर कार्यरत हैं, पर विद्यार्थियों को वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा एक उपयोगी व्याख्यान दिया गया। इसके बाद एक इंटरैक्टिव सत्र आयोजित हुआ और अंत में संयंत्र का दौरा कराया गया। विद्यार्थियों ने रिएक्टर संचालन, सुरक्षा उपायों और नियंत्रित परमाणु विखंडन से स्वच्छ एवं भरोसेमंद विद्युत उत्पादन की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझा।
भौतिकी विभाग के अध्यक्ष, प्रो. अनीसुल ऐन उस्मानी ने इस दौरे को “विद्यार्थियों के लिए परमाणु ऊर्जा उत्पादन के व्यावहारिक आयामों से जुड़ने का अमूल्य अवसर” बताया। इस यात्रा का समन्वय करने वाले प्रख्यात प्रयोगात्मक परमाणु भौतिक विज्ञानी, प्रो. बी. पी. सिंह ने इसके व्यापक सामाजिक महत्व पर बल देते हुए कहा कि परमाणु ऊर्जा के प्रति जन धारणा को सकारात्मक रूप से विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह स्वच्छ और सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विद्यार्थियों ने इस दौरे को अपने शैक्षणिक जीवन का “मील का पत्थर” बताते हुए गहरी प्रशंसा व्यक्त की। उनका कहना था कि पाठ्यपुस्तकों तक सीमित अवधारणाओं को प्रत्यक्ष अनुभव करना न केवल उनकी शैक्षणिक नींव को मजबूत करता है, बल्कि उन्हें भविष्य में परमाणु ऊर्जा प्रणालियों के विकास हेतु प्रेरित भी करता है। कई विद्यार्थियों ने इस अनुभव को भारत की विजन 2047 की भावना के अनुरूप एक सतत, कार्बन-मुक्त भविष्य की ओर योगदान करने वाली प्रेरणा बताया।
विद्यार्थियों के साथ भौतिकी विभाग के शिक्षक डॉ. सुधीर कुमार गुप्ता और डॉ. मोहम्मद शुऐब, शोधार्थी अकीब सिद्दीक और समवील अंसारी, तथा प्रयोगशाला कर्मचारी फैजान अली खान और नफीस अहमद भी उपस्थित थे।
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जेएन मेडीकल कालिज में कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग द्वारा आईसीटीडी और शल्य क्रिया में टांके लगाने पर कैडावरिक कार्यशाला का आयोजन
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग ने शल्य चिकित्सा में कौशल बढ़ाने के उद्देश्य से इंटरकॉस्टल ट्यूब ड्रेनेज (आईसीटीडी) और शल्य क्रिया में टांका लगाने पर पर एक प्रायोगिक कैडावरिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। की। यह कार्यशाला जेएनएमसी, अजमल खान तिब्बिया कॉलेज और निजी चिकित्सकों के जूनियर डॉक्टर्स, रेजिडेंट्स और संकाय सदस्यों की उत्साही भागीदारी के साथ संपन्न हुई।
कार्यशाला की शुरुआत डॉ. बिलाल बिन अस्फ, निदेशक, चेस्ट सर्जरी, चेस्ट ऑनको-सर्जरी और लंग ट्रांसप्लांट, मेडांता अस्पताल, गुरुग्राम, द्वारा ‘कार्सिनोमा फेफड़े में हाल की प्रगति’ विषयक आमंत्रित व्याख्यान से हुई। डॉ. अस्फ को उनके रोबोटिक थोरैसिक सर्जरी के क्षेत्र में पायनियर कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है।
समारोह में प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान, सहकुलपति (मुख्य अतिथि), और प्रो. मोहम्मद हबीब रजा, डीन एवं प्रिंसिपल, जेएनएमसी, के साथ कार्यशाला अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आजम हसीन (कार्डियोथोरेसिक सर्जरी) और प्रो. फजल-उर-रहमान (एनोमेट्री) उपस्थित थे। आयोजन सचिव प्रो. फरहान किरमानी और डॉ. आमिर मोहम्मद ने कार्यक्रम का समन्वय किया।
प्रो. मोहसिन खान ने जेएन मेडीकल कालिज की सराहना करते हुए कहा कि ये संस्थान पिछड़े वर्ग के मरीजों को अत्याधुनिक, प्रोटोकॉल-आधारित चिकित्सा सेवा प्रदान कर रहे हैं। प्रो. हबीब रजा ने जोर देते हुए बताया कि आईसीटीडी और सिलाई का अभ्यास करके आपातकालीन स्थितियों में अनगिनत जीवन बचाए जा सकते हैं।
कार्यशाला अध्यक्ष प्रो. आजम हसीन ने बताया कि आईसीटीडी एक जीवन रक्षक प्रक्रिया है, जिसे प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी को आना चाहिए, और इसे जीवित मरीज पर सिखाने में जो चुनौतियां हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए कैडावरिक प्रशिक्षण सुरक्षित और वास्तविक अनुभव प्रदान करता है। धन्यवाद ज्ञापन में प्रो. फजल-उर-रहमान ने कहा कि बड़ी संख्या में प्रतिभागियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि संरचित शल्य कौशल प्रशिक्षण की मांग लगातार बढ़ रही है।
कार्यशाला में प्रतिभागियों ने मानव कैडावरों पर आईसीटीडी लगाने, गाँठ बांधने और घाव सिलाई का अभ्यास किया, जिससे कार्यशाला की प्रायोगिक उपयोगिता की सराहना हुई। डॉ. मंजूर अहमद और डॉ. आमिर मोहम्मद ने सैद्धांतिक सत्र प्रस्तुत किए, जबकि डॉ. सैयद शमयाल रब्बानी ने तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया। डाक्टर मिदहत मुत्तकी ने कार्यक्रम का संचालन किया।
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शेखा झील पक्षी अभ्यारण्य में सारस क्रेन संरक्षण पर सामुदायिक जागरूकता कार्यशाला आयोजित
अलीगढ़, 30 सितम्बरः वैज्ञानिक अनुसंधान को सामुदायिक प्रयासों के साथ जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम शिखा झील बर्ड सेंचुअरी में उठाया गया। यहाँ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वन्यजीव विज्ञान विभाग की शोधार्थी आकसा जसीम ने प्रो. उरूस इलियास के निर्देशन में सारस क्रेन (ऐंटीगोन) के निवास स्थान संरक्षण और जलकुंभी प्रबंधन पर जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यक्रम में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सहयोग से पास के गाँवों के 50 से अधिक लोग शामिल हुए।
कार्यशाला में भारत के सबसे लंबे उड़ने वाले पक्षी, सारस क्रेन के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया, जिनका अस्तित्व स्वस्थ जलाभूतियों पर निर्भर करता है। सत्र का उद्घाटन करते हुए, प्रो. सतीश कुमार, अध्यक्ष, वन्यजीव विज्ञान विभाग ने प्रजाति के प्रजनन और आहार स्थल के नाजुक संतुलन पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. शरद कुमार ने स्थानीय समुदायों की भूमिका को पर्यावरणीय क्षरण के खिलाफ अग्रिम रक्षक के रूप में रेखांकित किया।
प्रो. उरूस इल्यास ने संरक्षण और आजीविका को जोड़ने पर चर्चा की और कहा कि पारिस्थितिकी संरक्षण और सतत विकास एक साथ चल सकते हैं। क्षेत्रीय वन अधिकारी ने सारस क्रेन को एक संकेतक प्रजाति के रूप में महत्व दिया, जो जलाभूति पारिस्थितिकी तंत्र की स्वास्थ्य स्थिति को दर्शाती है। ये पारिस्थितिकी तंत्र मानवों को भी बाढ़ नियंत्रण, जल शुद्धिकरण और जैव विविधता समर्थन जैसी महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान करते हैं।
कार्यशाला में प्रतिभागियों को शिखा झील की एक प्रमुख चुनौती आक्रामक जलकुंभी के अनियंत्रित फैलाव को नियंत्रित करने का प्रशिक्षण भी दिया गया। व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से ग्रामीणों ने जलकुंभी हटाने की तकनीकें सीखी और नवोन्मेषी समाधान तलाशे। आक्सा जसीम ने जलकुंभी को टोकरी और टोपी जैसी हस्तशिल्प वस्तुओं में परिवर्तित करने का विचार प्रस्तुत किया, जिससे एक पारिस्थितिक खतरे को आर्थिक संसाधन में बदला जा सके। उन्होंने भविष्य में ग्रामीणों को शिल्प कौशल प्रशिक्षण देने की भी प्रतिज्ञा की, जिससे संरक्षण के साथ-साथ आजीविका के अवसर भी उत्पन्न हों।
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एएमयू शिक्षक ने लखनऊ कार्यशाला में चिकित्सीय प्रयोग दिशानिर्देशों पर व्याख्यान प्रस्तुत किया
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के फार्माकोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सैयद शारिक नईम ने लखनऊ में इंटेग्रल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में आयोजित गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस (जीसीपी) कार्यशाला में व्याख्यान दिया।
डॉ. नईम, जो उत्तर प्रदेश के लिए सरकार द्वारा प्रमाणित जीसीपी ट्रेनर हैं, ने “भारत में क्लिनिकल ट्रायल से संबंधित वर्तमान नियम” और “सुरक्षा रिपोर्टिंग एवं प्रलेखन” विषयों पर बोलते हुए देश में क्लिनिकल रिसर्च के बदलते नियामक ढांचे पर चर्चा की। उन्होंने नए ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल नियमों तथा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की बायोमेडिकल एथिक्स गाइडलाइन्स का उल्लेख करते हुए इनके महत्व को रेखांकित किया और कहा कि ये नैतिक और पारदर्शी अनुसंधान सुनिश्चित करने में अहम हैं।
उन्होंने दवा के प्रतिकूल प्रभावों के प्रबंधन और परीक्षणों के दौरान सूक्ष्म प्रलेखन की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा, “सटीक सुरक्षा रिपोर्टिंग ही रोगियों की सुरक्षा और क्लिनिकल रिसर्च में भरोसा बनाए रखने का मूल आधार है।”
इस कार्यशाला में फैकल्टी सदस्यों और रेजिडेंट डॉक्टरों ने भाग लिया। यह कार्यशाला जीसीपी प्रशिक्षण का हिस्सा है, जो भारत में क्लिनिकल ट्रायल करने वाले अन्वेषकों के लिए अनिवार्य है।
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एएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने एमसीएच चिकित्सकों के लिए परिचयात्मक कार्यक्रम आयोजित किया
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने नव-प्रवेशित एमसीएच रेजिडेंट्स के लिए एक ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया, जिसका उद्देश्य उन्हें संस्थागत मूल्यों, शैक्षणिक दायित्वों और सामुदायिक सेवा की भावना से परिचित कराना था।
विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद खुर्रम ने स्वागत भाषण में कहा कि यह ओरिएंटेशन रेजिडेंट्स को अकादमिक और नैदानिक अभ्यास की अपनी दोहरी भूमिकाओं में ढलने में मदद करेगा।
मुख्य अतिथि राजनीति विज्ञान विभाग के डॉ. मोहम्मद असलम ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा को सामाजिक उत्तरदायित्व से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने युवा रेजिडेंट्स से आग्रह किया कि वे अकादमिक, अनुसंधान, कार्यक्रम प्रबंधन और लोक प्रशासन में सेवा भावना के साथ विशेषज्ञ बनें। उन्होंने नेतृत्व, सुशासन और सहानुभूति की भूमिका पर विशेष जोर दिया।
वरिष्ठ शिक्षक प्रो. इमरान अहमद ने रोगी देखभाल में ध्यानपूर्वक सुनने के महत्व पर बल दिया, जबकि डॉ. शेख सरफराज अली ने बताया कि प्रभावी संवाद कैसे विश्वास को मजबूत करता है और चिकित्सीय परिणामों को बेहतर बनाता है।
इसके साथ ही कई सामुदायिक कल्याण अभियानों का आयोजन किया गया, जिनमें स्वच्छता पखवाड़ा, स्वस्थ नारी अभियान, वृक्षारोपण अभियान और सफाई कर्मचारी स्वास्थ्य शिविर शामिल थे। आभार स्वरूप एक सफाई कर्मचारी को प्रतीकात्मक रूप से साइकिल भेंट की गई।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. आकांशा चैहान ने किया।
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एएमयू के दूरवर्ती शिक्षा एवं आॅनलाइन एजूकेशन केन्द्र में स्वच्छता उत्सव का आयोजन
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के दूरवर्ती शिक्षा एवं ऑनलाइन एजुकेशन केन्द्र ने स्वच्छता उत्सव मनाया और स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण बनाए रखने की शपथ ली।
केंद्र के निदेशक प्रो. मोहम्मद नफीस अहमद अंसारी ने स्वच्छता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वच्छ वातावरण स्वास्थ्य, अनुशासन और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देता है। उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन जैसी सरकारी पहलों की सराहना की, जिसने देशभर में स्वच्छता और कचरा प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाई है।
कार्यक्रम के दौरान सफाई अभियान चलाया गया, जिसमें रास्तों की झाड़ू लगाना, कचरा इकट्ठा करना और कचरे के पृथक्करण को बढ़ावा देना शामिल था। प्रो. अंसारी ने सभी से आग्रह किया कि स्वच्छता की आदतों को अपने दैनिक जीवन और आस-पड़ोस तक फैलाएं और इसे एक सतत प्रयास बनाएं, न कि केवल एक दिन की गतिविधि।
कार्यक्रम का समापन सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वच्छता बनाए रखने और हरित व स्वस्थ भविष्य के लिए सामुदायिक एवं सरकारी पहलों को सहयोग देने की शपथ के साथ हुआ।
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एएमयू शोधार्थियों ने शंघाई में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन में प्रस्तुत किए शोध पत्र
अलीगढ़, 30 सितम्बररू अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पश्चिम एशियाई और उत्तर अफ्रीकी अध्ययन विभाग के शोधार्थी मोहम्मद वसीम और उजमा अफजल ने चीन के शंघाई इंटरनेशनल स्टडीज यूनिवर्सिटी के मिडिल ईस्ट स्टडीज इंस्टिट्यूट द्वारा आयोजित एशिया और मध्य पूर्व पर 9वें अंतरराष्ट्रीय अकादमिक फोरम में अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
सम्मेलन का मुख्य विषय “मानवता के साझा भविष्य वाले समुदाय के दृष्टिकोण से विश्व और मध्य पूवर्रू बड़े परिवर्तन और नए विकास’’ था।
मोहम्मद वसीम ने “ज्ञान-आधारित समाजों अथवा ज्ञान अर्थव्यवस्थाओं में गैर-अरब निवासी परिवारों की भूमिका” विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किया, जबकि उजमा अफजल ने “महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता का सामनाः अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और खाड़ी क्षेत्र में कतर का रणनीतिक संतुलन” विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।
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एएमयू के मिलट शोध दल ने हैदराबाद स्थित आईसीएआर-आईआईएमआर का दौरा किया
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का एक शोध दल, जो एचईएफए द्वारा वित्तपोषित “मधुमेह पर बाजरे के सेवन के प्रभाव” पर शोध कर रहा है, हाल ही में तेलंगाना स्थित आईसीएआर-इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च (आईआईएमआर), हैदराबाद गया।
दल का नेतृत्व प्रमुख अन्वेषक एवं इलाज-बित-तदबीर विभागाध्यक्ष, यूनानी चिकित्सा संकाय की प्रो. असिया सुल्ताना ने किया। दल में सह-प्रमुख अन्वेषक डॉ. हामिद अशरफ (राजीव गांधी सेंटर फॉर डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी, जेएनएमसी, एएमयू) तथा जूनियर रिसर्च फेलो डॉ. शमामा उस्मानी (इलाज-बित-तदबीर विभाग, एएमयू) भी शामिल थीं।
एएमयू प्रतिनिधिमंडल ने आईआईएमआर की निदेशक डॉ. तारा सत्यवती और न्यूट्रिहब के निदेशक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा प्रधान वैज्ञानिक डॉ. जे. स्टेनली से बाजरा शोध परियोजना और भविष्य में न्यूट्रास्यूटिकल्स एवं वैल्यू-एडिशन टेक्नोलॉजीज, विशेषकर बाजरे पर केंद्रित सहयोगी शोध की संभावनाओं पर सार्थक चर्चा की।
आईआईएमआर के निदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने एएमयू प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत किया। बैठक ने राष्ट्रीय ईट-राइट अभियान को आगे बढ़ाने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाया, जिसका उद्देश्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन है।
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पोलैंड में दक्षिण एशियाई भाषाओं पर आॅनलाइन सम्मेलन में प्रो. एम. जे. वारसी का अध्यक्षीय संबोधन
अलीगढ़, 30 सितम्बरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष तथा लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, प्रो. एम. जे. वारसी ने 29 सितम्बर को पोलैंड के पोज्नान स्थित एडम मिकेविच विश्वविद्यालय में आयोजित 39वें साउथ एशियन लैंग्वेजेज एनालिसिस राउंडटेबल (एसएएलए-39) में ऑनलाइन माध्यम से अध्यक्षीय संबोधन प्रस्तुत किया।
1978 में यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय (अमेरिका) में लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ अमेरिका के भाषाविज्ञान संस्थान के दौरान स्थापित एसएएलए, दक्षिण एशियाई भाषाविज्ञान के विशेषज्ञों का विश्व स्तर पर सबसे प्रमुख मंच है, जिसमें दुनियाभर से विद्वान भाग लेते हैं।
अपने संबोधन में प्रो. वारसी ने दक्षिण एशिया को विश्व के सबसे जटिल भाषायी क्षेत्रों में से एक बताया, जिसमें चार प्रमुख भाषा-परिवार इंडो-आर्यन, द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाटिक और तिब्बती-बर्मन के साथ-साथ कुछ विशिष्ट स्वतंत्र भाषाएँ भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र सदियों से हो रहे प्रवास तथा समकालीन सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण भाषायी दृष्टि से निरंतर उतार-चढ़ाव का साक्षी रहा है, जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश शामिल हैं।
“दक्षिण एशिया में भाषा-परिवारों के बीच साझा भाषायी विशेषताओं का अध्ययन” विषय पर बोलते हुए प्रो. वारसी ने स्पष्ट किया कि भले ही ये भाषाएँ अलग-अलग परिवारों से संबंधित हों, फिर भी इनमें कई साझा विशेषताएँ पाई जाती हैं, जैसे मूर्धन्य ध्वनियाँ, कर्ता- कर्म-क्रिया वाक्य क्रम, पूर्वसर्गों का अभाव, रूपात्मक पुनरावृत्ति और जटिल क्रियापद संरचनाएँ। उन्होंने कहा कि ये विशेषताएँ गहरे ऐतिहासिक संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रतिबिंबित करती हैं।
प्रो. वारसी ने यह भी रेखांकित किया कि दक्षिण एशिया की भाषायी विविधता न केवल संपर्क भाषाविज्ञान और प्रकारिकी (टायपोलोजी) की समझ को समृद्ध करती है, बल्कि वैश्वीकरण के दौर में लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और प्रलेखन की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।
भविष्य की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि भाषाविज्ञान आज तकनीकी नवाचारों, संज्ञानात्मक अनुसंधानों और वैश्विक संचार आवश्यकताओं से नया स्वरूप ले रहा है। उन्होंने विद्वानों का आह्वान किया कि वे नवाचार और समावेशिता के बीच संतुलन बनाएँ, ताकि भाषावैज्ञानिक अनुसंधान और शिक्षा विश्व स्तर पर प्रभावशाली और सुलभ बनी रहे।
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एएमयू की सीति समिति द्वारा 24 से 29 अक्टूबर तक सीरत उन नबी कार्यक्रम का आयोजन
अलीगढ़, 30 सितंबरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की सीरत समिति द्वारा 24 से 29 अक्टूबर तक सात दिवसीय सीरत-उन-नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कक्षा 1 से 8 और कक्षा 9 से 12 के विद्यार्थियों के लिए कविता पाठ, नात पाठ, भाषण, लेखन और सीरत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएंगी।
सुन्नी धर्मशास्त्र विभाग के अध्यक्ष और सीरत कमेटी के कनवीनर प्रो. मोहम्मद राशिद ने बताया है कि इच्छुक छात्र सम्बन्धित स्कूल हर स्तर पर दो छात्रों के नाम स्कूल के लैटरपेड पर हस्ताक्षर करके सुन्नी धर्मशास्त्र के कार्यालय में 3 अक्अूबर तक जमा करा सकते हैं। उन्होंने कहा है कि अंतिम तिथि के बाद किसी प्रकार का पंजीकरण नहीं होगा।
















