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ऑपरेशन सिंदूर की सफलता की खुशी में जामिया में तिरंगा मार्च का AISA ने किया विरोध

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ ✑15 मई : 2025

नई दिल्ली, 15 मई 2025 |

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में 13 मई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता के उपलक्ष्य में निकाले गए ‘तिरंगा मार्च’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने इस मार्च की कड़ी आलोचना की है और इसे “जामिया प्रशासन की युद्धोन्मादी सोच” करार दिया है।

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया था। इस सैन्य कार्रवाई की सफलता के उपलक्ष्य में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के “राष्ट्र प्रथम” अभियान के तहत जामिया विश्वविद्यालय ने तिरंगा मार्च का आयोजन किया। मार्च सेंटेनरी गेट से शुरू होकर DSW लॉन पर समाप्त हुआ, जिसमें कुलपति प्रोफेसर मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर महताब आलम रिजवी ने भाग लिया।

AISA JMI ने बयान जारी कर कहा, “तिरंगा मार्च सैन्य कार्रवाई का जश्न मनाने का जरिया बन गया, जो उन निर्दोष लोगों का अपमान है जो युद्ध की भेंट चढ़ जाते हैं।”

छात्र संगठन ने कहा कि भारत-पाक तनाव के कारण आम नागरिकों की ज़िंदगी और शांति खतरे में पड़ गई है। AISA का कहना है कि विश्वविद्यालयों को सरकार की प्रचार मशीनरी नहीं बनना चाहिए, बल्कि उन्हें लोकतंत्र और बहस के मंच की भूमिका निभानी चाहिए।

AISA ने आरोप लगाया कि हमले के बाद देश में मुस्लिमों और कश्मीरियों को निशाना बनाकर नफरत फैलाने वाली घटनाएं बढ़ गई हैं। ऑल इंडिया पीपुल्स कॉन्फिडेंस रिपोर्ट (APCR) के अनुसार ऐसे 184 मामलों की पुष्टि हुई है। AISA ने इसके लिए बीजेपी की IT सेल और कॉरपोरेट मीडिया को ज़िम्मेदार बताया, जो उनके मुताबिक, “झूठी खबरों और भावनात्मक उकसावे से युद्ध का माहौल बना रहे हैं।”

AISA ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह शांति, मानवाधिकार और स्वतंत्र पत्रकारिता की आवाजों को दबा रही है। संगठन ने कहा कि कश्मीर पहले से ही सैन्य दमन, राजनीतिक उपेक्षा और मानवाधिकार उल्लंघनों से जूझ रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी कई निर्दोष नागरिकों की जान गई या वे घायल हुए, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई जवाबदेही नहीं दिखाई गई।

AISA ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए भाषण पर भी सवाल उठाए और कहा कि उन्होंने न तो पहलगाम हमले के दोषियों का जिक्र किया और न ही सीमा पर मारे गए नागरिकों को मुआवजा देने की बात की। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा प्रस्तावित युद्धविराम पर भारत की प्रतिक्रिया का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया।

AISA का कहना है कि विश्वविद्यालय का काम तर्क, असहमति और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना है। लेकिन जब छात्रों की आवाजें दबाई जा रही हों और निगरानी बढ़ रही हो, तो प्रशासन द्वारा ऐसे आयोजन कराना गलत संदेश देता है।

AISA ने जामिया के छात्रों और समुदाय से अपील की है कि वे युद्ध, नफरत और अन्याय की राजनीति का विरोध करें और शांति, लोकतंत्र और न्याय के समर्थन में आवाज बुलंद करें।

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