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एकात्म मानव दर्शन से अंत्योदय की ओर : पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ग्रामीण विकास दृष्टि

बुटा सिंह
सहायक आचार्य,
ग्रामीण विकास विभाग,
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली

आज, 25 सितंबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती के पावन अवसर पर, हम उस अप्रतिम दार्शनिक और विचारक को नमन करते हैं, जिन्होंने भारतीय चिंतन परंपरा के आधार पर राष्ट्र के उत्थान का एक मौलिक मार्ग दिखाया। उनका प्रतिपादित ‘एकात्म मानव दर्शन’ (Integral Humanism) पश्चिमी पूंजीवाद और मार्क्सवादी समाजवाद की चरम सीमाओं को अस्वीकार करते हुए, एक स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मॉडल प्रस्तुत करता है। इस दर्शन के केंद्र में समग्र मानव है और इसका व्यावहारिक लक्ष्य ‘अंत्योदय’ (समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय) है। उपाध्याय जी की ग्रामीण विकास की संकल्पना इसी अद्वितीय एकात्म मानव दर्शन और अंत्योदय के सिद्धांत पर टिकी हुई है, जो आज भी भारत के लिए एक आधारभूत मंत्र है।

 1. एकात्म मानव दर्शन: विकास का भारतीय आधार

दीनदयाल जी के अनुसार, मनुष्य केवल शरीर नहीं है, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक समुच्चय (Integral being) है। उनका मानना था कि किसी भी विकास योजना में मानव के इन चारों पहलुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि उसका सर्वांगीण विकास हो सके।

 * समग्रता और सामंजस्य: यह दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और संपूर्ण सृष्टि के बीच एकात्म संबंध देखता है। इसका अर्थ है कि विकास की कोई भी योजना इस व्यापक संदर्भ से अलग नहीं हो सकती। यह प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के बजाय सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल देता है।

 * पुरुषार्थ चतुष्टय: उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे भारतीय पुरुषार्थों की अवधारणा को स्वीकार किया, जिसमें अर्थ (धन) और काम (इच्छाएँ) को धर्म (नैतिकता) के अनुरूप संचालित करने पर बल दिया गया। यह भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के बीच संतुलन स्थापित करता है।

 * स्वदेशी और आत्मनिर्भरता: उपाध्याय जी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत का विकास मॉडल अपनी संस्कृति, जलवायु और आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए, न कि विदेशी विचारों की नकल। उन्होंने आत्मनिर्भरता (Self-Reliance) को राष्ट्र के स्वाभिमान और स्थायित्व के लिए आवश्यक माना।

 2. अंत्योदय का सिद्धांत: ग्रामीण उत्थान का मूलमंत्र

एकात्म मानव दर्शन का व्यावहारिक और सर्वोच्च लक्ष्य अंत्योदय के सिद्धांत में निहित है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “अंतिम (अंत्य) व्यक्ति का उत्थान (उदय)”। ग्रामीण विकास के संदर्भ में, यह सिद्धांत एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है:

 * वंचितों का सर्वाधिकार: विकास के लाभ सबसे पहले और सबसे अधिक ग्रामीण क्षेत्रों के सबसे गरीब, सबसे पिछड़े और हाशिए पर खड़े व्यक्तियों तक पहुँचने चाहिए। यह संसाधन वितरण में सकारात्मक भेदभाव का पक्षधर है।

 * मानव गरिमा की पुनर्स्थापना: हर व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो, गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। ग्रामीण विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास प्रदान करना है।

 * भेदभाव रहित समाज: दीनदयाल जी किसी भी प्रकार के सामाजिक या आर्थिक भेदभाव के विरुद्ध थे। उनके अंत्योदय की संकल्पना में जाति, वर्ग या पंथ पर आधारित ऊँच-नीच के लिए कोई स्थान नहीं था, यह सामाजिक समरसता का प्रबल पक्षधर है।

 3. उपाध्यायजी की ग्रामीण विकास संकल्पना : क्रियान्वयन की रणनीति

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ग्रामीण विकास की संकल्पना उनके एकात्मता और अंत्योदय के सिद्धांतों का प्रत्यक्ष परिणाम है, जो ग्राम-केंद्रित और विकेन्द्रीकृत अर्थनीति पर आधारित है।

क. विकेन्द्रीकृत और ग्राम-केंद्रित अर्थनीति

उन्होंने बड़े उद्योगों के बजाय गाँव को अर्थव्यवस्था की इकाई मानने पर बल दिया।

 * कुटीर एवं लघु उद्योग: ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत की, जो स्थानीय संसाधनों और कौशल पर आधारित हों और जिससे ग्रामीण कारीगरों का पलायन रुके।

 * कृषि की प्राथमिकता: कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदंड मानते हुए, उन्होंने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और कृषि को लाभकारी तथा टिकाऊ बनाने के लिए नीतियों पर ज़ोर दिया।

 * ग्राम स्वराज और विकेन्द्रीकरण: सत्ता और आर्थिक गतिविधियों का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है ताकि ग्रामीण लोग स्वयं अपने विकास की योजना बना सकें और उसे क्रियान्वित कर सकें।

ख. कौशल विकास और स्थायी रोज़गार

ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोकने और उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए कौशल विकास को महत्वपूर्ण माना गया।

 * उन्होंने ऐसी योजनाओं की आवश्यकता बताई जो गरीब ग्रामीण युवाओं को न केवल प्रशिक्षण दें, बल्कि उन्हें नियमित न्यूनतम मजदूरी के साथ स्थायी और लाभकारी रोजगार भी सुनिश्चित करें।

 * उदाहरण: वर्तमान में दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) जैसी पहलें उनके इसी विचार को साकार करने की दिशा में एक सशक्त कदम है।

ग. सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य

समग्र मानव के विकास के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों में सुनिश्चित करना अनिवार्य है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जुड़ी हो और ग्रामीणों को आत्मविश्वास तथा ज्ञान प्रदान करे। साथ ही, ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए।

 निष्कर्ष : वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन से अंत्योदय की ओर का विचार आज भी ग्रामीण विकास और राष्ट्र निर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। आज जब विश्व पूंजीवाद की असमानताओं, पर्यावरणीय संकटों और अनियोजित शहरीकरण से जूझ रहा है, तब उनका दर्शन सतत विकास (Sustainable Development) का मार्ग दिखाता है, जो आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘लोकल फॉर वोकल’ और ‘ग्राम स्वराज’ जैसी वर्तमान सरकारी पहलें दीनदयाल जी की सोच का ही प्रत्यक्ष प्रभाव हैं। उनका दर्शन हमें सिखाता है कि वास्तविक राष्ट्रीय विकास तभी संभव है जब वह मानव-केंद्रित हो, स्वदेशी हो, और समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) को केंद्र में रखकर किया जाए।

आज उनकी जयंती पर, हमें उनके इस अमूल्य विचार को अपने कार्य और नीतियों का आधार बनाना चाहिए।

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