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प्रो. एम. जे. वारसी का इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेस यूनिवर्सिटी शिलांग में व्याख्यान

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

अलीगढ़, 28 अगस्तः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग पूर्व अध्यक्ष, प्रख्यात भाषाविद प्रो. एम. जे. वारसी ने ‘भारतीय भाषा परिवारः भाषाई और साहित्यिक विनिमय के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में आमंत्रित व्याख्यान दिया। यह सम्मेलन 28-29 अगस्त, 2025 को इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेस यूनिवर्सिटी (ईएफएलयू), शिलांग और भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया।

प्रो. वारसी ने ‘भारत के विविध सांस्कृतिक परिदृश्यों के बीच एकता बनाए रखने में भाषाई और साहित्यिक परंपराओं की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए बताया कि भाषाई और साहित्यिक आदान-प्रदान सहानुभूति को बढ़ावा देते हैं, एकता को पोषित करते हैं, और राष्ट्र की साझा दृष्टि के निर्माण में सहायक होते हैं।

उन्होंने कहा कि भाषा विभिन्न समुदायों के बीच आपसी समझ का आधार है। अनुवाद, शिक्षा और अंतर-सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से भाषाई आदान-प्रदान क्षेत्रों के बीच पुल का कार्य करता है, जिससे लोग एक-दूसरे की सांस्कृतिक विरासत को समझने और सराहने लगते हैं।

प्रो. वारसी ने आगे कहा कि हर भारतीय भाषा अपने भीतर सदियों पुरानी साहित्यिक, दार्शनिक, लोककथाओं और मौखिक परंपराओं की धरोहर को समेटे हुए है। संस्कृत, तमिल, कन्नड़, बंगाली, हिंदी, उर्दू, मलयालम, तेलुगु, मराठी, पंजाबी और सैकड़ों जनजातीय भाषाएं भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को संजोए हुए हैं, जो वर्तमान पीढ़ियों को उनके पारंपरिक ज्ञान और विरासत से जोड़ती हैं।

अपने समापन संबोधन में प्रो. वारसी ने इस बात पर जोर दिया कि भाषाई और साहित्यिक आदान-प्रदान के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए प्रगतिशील नीतियों की आवश्यकता है। जिनमें भाषनी प्रोजेक्ट जैसे डिजिटल टूल्स का उपयोग, एक भारत श्रेष्ठ भारत जैसी सांस्कृतिक पहलों का विस्तार,   बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020) में प्रस्तावित मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की अवधारणा को लागू करना शामिल हैं

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