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इलाहाबाद हाई कोर्ट: निजी अस्पताल मरीजों को मान रहे ‘ATM’ और ‘गिनी पिग

निजी अस्पताल मरीजों को मान रहे ‘ATM’ और ‘गिनी पिग’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉक्टर को राहत देने से किया इनकार

प्रयागराज, जुलाई 2025
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में मरीजों को ‘गिनी पिग’ और ‘एटीएम मशीन’ की तरह देखा जा रहा है, जहां मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना बन चुका है, न कि मरीज की जान बचाना। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक डॉक्टर की याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी।

मामला क्या है?

29 जुलाई 2007 को देवरिया जिले में एक गर्भवती महिला को याची डॉ. अशोक कुमार राय के निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। महिला के परिजनों ने सुबह 11 बजे ऑपरेशन के लिए सहमति दे दी थी, लेकिन आरोप है कि नर्सिंग होम में एनेस्थेटिस्ट (बेहोशी देने वाला विशेषज्ञ) न होने के कारण सर्जरी को शाम 5:30 बजे तक टाल दिया गया।

इतना ही नहीं, जब मरीज के परिजनों ने देरी पर आपत्ति जताई, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने कथित रूप से उनके साथ मारपीट भी की। इसी देरी के चलते भ्रूण की मृत्यु हो गई।

इस घटना के बाद डॉक्टर राय के खिलाफ चिकित्सकीय लापरवाही के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। उन्होंने इस एफआईआर और देवरिया की ACJM कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

डॉक्टर की दलीलें और कोर्ट का रुख

याचिकाकर्ता डॉक्टर ने अपनी दलील में कहा कि उनके पास आवश्यक चिकित्सा योग्यता है और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष लापरवाही साबित नहीं हुई है।

हालांकि, जस्टिस प्रशांत कुमार की अध्यक्षता वाली एकल पीठ ने डॉक्टर की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर ऑपरेशन के लिए सहमति मिलने और सर्जरी करने के बीच हुई 4-5 घंटे की देरी को उचित ठहराने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस देरी के कारण ही भ्रूण की मौत हुई।

‘क्लासिक केस’ है यह मामला

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इसे “क्लासिक मामला” बताया, जिसमें बिना किसी मेडिकल कारण के ऑपरेशन में लंबी देरी हुई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ कि मृत्यु प्रसव पीड़ा के अत्यधिक बढ़ जाने के कारण हुई।

डॉक्टरों की सुरक्षा पर टिप्पणी

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चिकित्सा लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों को तभी सुरक्षा मिल सकती है, जब वे अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा, योग्यता और मानवीय संवेदनशीलता के साथ निभाएं। यदि डॉक्टर सामान्य देखभाल भी नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी बनती है।

निजी अस्पतालों को दी चेतावनी

अदालत ने कड़े शब्दों में कहा:

“ऐसे डॉक्टर और अस्पताल जो बिना पर्याप्त सुविधाओं, योग्य स्टाफ और चिकित्सा उपकरणों के नर्सिंग होम चला रहे हैं, वे केवल मरीजों को लुभाकर पैसे ऐंठने में लगे हैं। ऐसे में वे न तो मरीजों की जिंदगी के प्रति जवाबदेह हैं और न ही पेशे के प्रति ईमानदार।”

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