1 जुलाई से लागू कानून को चीन राष्ट्रीय एकता का माध्यम बता रहा, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने इसे सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया
हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :
बीजिंग। चीन में 1 जुलाई से लागू हुए एथनिक यूनिटी लॉ (Ethnic Unity Law) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। चीन सरकार इसे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और अलगाववाद पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कानून बता रही है, जबकि मानवाधिकार संगठनों और कई पश्चिमी देशों का आरोप है कि यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास है।
क्या है कानून का उद्देश्य?
चीनी सरकार का कहना है कि यह कानून सभी जातीय समूहों को एक समान राष्ट्रीय पहचान के तहत जोड़ने, सामाजिक समरसता बढ़ाने और उग्रवाद व अलगाववाद पर नियंत्रण के लिए बनाया गया है। इसके तहत शिक्षा, भाषा और प्रशासनिक नीतियों में एकरूपता लाने पर जोर दिया गया है।
‘सिनाइज़ेशन’ को लेकर बढ़ी चिंता
आलोचकों का कहना है कि यह कानून चीन की ‘सिनाइज़ेशन’ नीति को कानूनी आधार देता है। इसके तहत अल्पसंख्यकों को मैंडरिन भाषा अपनाने, पारंपरिक संस्कृति और पहनावे में बदलाव तथा धार्मिक गतिविधियों को सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप ढालने के लिए प्रेरित या बाध्य किया जा सकता है। विशेष रूप से शिनजियांग और तिब्बत जैसे क्षेत्रों को लेकर चिंता जताई जा रही है।
वैश्विक स्तर पर विरोध
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ के कई देशों ने इस कानून की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी पारदर्शी जांच और प्रभावित क्षेत्रों में स्वतंत्र निरीक्षण की मांग की है। कुछ देशों ने इस कानून के क्रियान्वयन से जुड़े चीनी अधिकारियों पर वीज़ा प्रतिबंध और अन्य कार्रवाई भी की है।
क्या पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि कानून का प्रभाव केवल सामाजिक और राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहेगा। शिक्षा, रोजगार, स्थानीय संस्कृति, व्यापार और वैश्विक निवेश पर भी इसका असर पड़ सकता है। हालांकि चीन इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए इसे अपने आंतरिक मामलों का विषय बता रहा है। आने वाले समय में कानून के वास्तविक प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर दुनिया की नजर रहेगी।













