SC आरक्षण में उप-श्रेणी और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर बढ़ा विवाद, बिहार के दलित वोटबैंक का समीकरण भी अहम
पटना। बिहार की राजनीति में अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच शुरू हुआ मतभेद अब खुली राजनीतिक तकरार में बदल गया है। दोनों नेता मोदी सरकार में मंत्री हैं, लेकिन आरक्षण की समीक्षा और इसके लाभ के बंटवारे को लेकर उनके रुख एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। विवाद इतना बढ़ चुका है कि दोनों ने एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक कर दी है।
चिराग पासवान SC आरक्षण में उप-श्रेणी बनाने के विचार का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि दलित समुदाय के भीतर अलग-अलग कोटा या क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था लागू करने से सामाजिक एकता प्रभावित हो सकती है। वह मानते हैं कि SC आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी असमानताएं हैं।
वहीं, जीतन राम मांझी का कहना है कि आरक्षण का लाभ सभी दलित जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। उनके मुताबिक कुछ जातियां आज भी बेहद पिछड़ी हैं, इसलिए आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा कर सबसे वंचित समुदायों तक उसका लाभ पहुंचाना जरूरी है।
बिहार के जातिगत सर्वे से जुड़े आंकड़े इस विवाद की राजनीतिक पृष्ठभूमि को और स्पष्ट करते हैं। उपलब्ध सरकारी नौकरी के आंकड़ों के मुताबिक, SC समुदाय में दुसाध के करीब 99,230, राम समुदाय के 82,290, धोबी के 34,372, पासी के 25,754, मुसहर के 10,615 और डोम समुदाय के 3,274 लोग सरकारी नौकरी में बताए गए हैं। आबादी के अनुपात में भी इन समुदायों की हिस्सेदारी में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
यही आंकड़े मांझी के तर्क को आधार देते हैं कि SC आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत मजबूत दलित समूहों तक अधिक पहुंचा है। दूसरी ओर, चिराग के लिए यह मुद्दा उनके पारंपरिक दुसाध/पासवान सामाजिक आधार से भी जुड़ा है।
दरअसल, यह सिर्फ आरक्षण नीति का विवाद नहीं, बल्कि बिहार के बदलते जातीय समीकरण की लड़ाई भी है। चिराग पासवान दुसाध/पासवान समुदाय के प्रमुख राजनीतिक चेहरे हैं, जबकि मांझी मुसहर समुदाय की आवाज माने जाते हैं। ऐसे में दोनों नेताओं के अलग-अलग रुख के पीछे अपने-अपने सामाजिक आधार की राजनीतिक जरूरतें भी दिखाई देती हैं।
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