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“अगला दशक होगा करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट”: डॉ. अंकित शाह

– आईटी सेक्टर में गिरावट, कोर इंजीनियरिंग और इंडिज़न टेक्नोलॉजी को बताया भविष्य का केंद्र

नई दिल्ली।
दुनिया भर में बदलते आर्थिक और भू-राजनीतिक परिदृश्यों के बीच, करियर और शिक्षा की दिशा को लेकर युवाओं के बीच असमंजस बढ़ता जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में प्रसिद्ध विश्लेषक डॉ. अंकित शाह ने एक पॉडकास्ट में आने वाले दशक के “रियल करियर ट्रेंड्स” पर खुलकर चर्चा की। यह पॉडकास्ट युवाओं और छात्रों के बीच तेजी से वायरल हो रहा है क्योंकि इसमें आज के “फैशनेबल करियर” के पीछे छिपे बड़े आर्थिक समीकरणों को सरल भाषा में समझाया गया है।


🎓 शिक्षा का असली उद्देश्य “लाइफ स्किल्स”, न कि पैकेज

डॉ. अंकित शाह ने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली का मूल उद्देश्य जीवन कौशल (Life Skills) सिखाना होना चाहिए — न कि केवल नौकरी प्राप्त करना। उन्होंने कहा —

“एजुकेशन का कंटेंट राज्य या मार्केट नहीं, गुरु तय करते थे। लेकिन अब कंटेंट प्रॉफिट-बेस्ड हो चुका है। एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स अब सिर्फ पैकेज दिखा रहे हैं, शिक्षा नहीं।”

उन्होंने बताया कि भारत में परंपरागत रूप से शिक्षा “एंटरप्राइजिंग माइंडसेट” विकसित करने का माध्यम थी, न कि नौकरी पर निर्भर बनने का। “प्राचीन भारत में नौकरी को अंतिम विकल्प (Dependency) माना जाता था, लेकिन अब हमने उसे लक्ष्य बना लिया है,” उन्होंने कहा।


💻 आईटी सेक्टर में बूम का दौर समाप्ति की ओर

कंप्यूटर साइंस और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में छात्रों की बढ़ती रुचि पर डॉ. शाह ने कहा कि पिछले 30–40 वर्षों का आईटी बूम अब अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने स्पष्ट कहा —

“आईटी सेक्टर में जो पेमेंट और जॉब्स पिछले दो दशकों में दिखे, वे डॉलर-आधारित व्यवस्था की देन थे। जैसे-जैसे ‘डी-डॉलराइजेशन’ बढ़ेगा, वैसे-वैसे ये पेमेंट्स घटेंगे। आने वाले 10 साल तक आईटी सेक्टर में ‘स्लैक पीरियड’ रहेगा।”

उन्होंने बताया कि यह पूरी व्यवस्था 1971 के बाद से पश्चिमी देशों की “मुफ़्त धन-छपाई” (Free Money Printing) नीति पर टिकी रही, जिससे भारत जैसे देशों से ‘ब्रेन ड्रेन’ हुआ और असली नवाचार (Innovation) रुक गया। अब जब डॉलर की क्रय-शक्ति (Purchasing Power) गिर रही है, तो कंपनियाँ वेस्ट की जगह एशिया और भारत की ओर रुख करेंगी।


⚙️ “इंजीनियरिंग का असली भविष्य कोर सेक्टरों में है”

शाह ने कहा कि भविष्य में सबसे अधिक आवश्यकता सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, माइनिंग और एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में होगी।

“भारत अभी बनना बाकी है। सड़कें, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में असली इंजीनियरों की जरूरत है, न कि केवल कोडिंग जानने वालों की।”

उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे टेक्नोलॉजी को अपने कोर सेक्टर के भीतर एक टूल की तरह इस्तेमाल करना सीखें। “स्पेस टेक, डिफेंस टेक और फूड प्रोसेसिंग में एआई या ऑटोमेशन को कैसे जोड़ा जा सकता है — यही भविष्य की दिशा है।”


🧠 “ऑटोमेशन से डरें नहीं, स्किल्स अपडेट करें”

डॉ. शाह ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जॉब्स खत्म नहीं करेगा, बल्कि “री-डिफाइन” करेगा।

“ऑटोमेशन सबसे पहले रिपीटिव टास्क्स को खत्म करेगा — लेकिन जहां रचनात्मकता, निर्णय क्षमता या फिजिकल स्किल्स की जरूरत होगी, वहां इंसान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होगी।”

उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि “अब ट्रक ड्राइवर की आय कई टेक-जॉब्स से ज्यादा है — क्योंकि वहां फिजिकल स्किल्स की कद्र बढ़ रही है।”


🌍 “डी-डॉलराइजेशन के बाद भारत बनेगा वैश्विक जॉब हब”

डॉ. शाह के अनुसार, आने वाले 5–10 साल भारत के लिए निर्णायक होंगे।

“जैसे-जैसे पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ असंतुलित होंगी, वैसे-वैसे कंपनियाँ भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, गल्फ और रूस जैसे क्षेत्रों में अपने ऑपरेशन शिफ्ट करेंगी। भारत को इसमें सबसे बड़ा लाभ मिलेगा।”

उन्होंने कहा कि गल्फ क्षेत्र, विशेष रूप से दुबई और सूरत, आने वाले दशक के “वैश्विक आर्थिक केंद्र” बन सकते हैं।


🧬 “विदेशी डिग्रियों का दौर भी अब घटने वाला है”

उन्होंने कहा कि वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग और विश्वसनीयता तेजी से गिर रही है।

“2030 के बाद वेस्टर्न डिग्रियों का ग्लोबल वैल्यू खत्म हो जाएगा। जो भी तकनीकी या प्रबंधन की शिक्षा होगी, वह ‘स्थानीय जरूरतों’ पर आधारित होगी — यानी भारत की इंडीज़न टेक्नोलॉजी और स्वदेशी शिक्षा पद्धति पर।”

उनका मानना है कि “आत्मनिर्भर भारत” और “विकसित भारत 2047” जैसे कार्यक्रमों के तहत आने वाले वर्षों में स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप को नई गति मिलेगी।


🩺 “मेडिकल और आयुष इंडस्ट्री का सुनहरा दौर”

मेडिकल क्षेत्र पर चर्चा करते हुए डॉ. शाह ने कहा कि आयुष, नेचुरोपैथी और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का पुनर्जागरण होने वाला है।

“डी-डॉलराइजेशन के साथ डी-कॉलोनाइजेशन भी चल रहा है। जब दुनिया पश्चिमी स्टैंडर्डाइजेशन से बाहर आएगी, तब भारत का प्राचीन वैद्यक ज्ञान दोबारा विश्व-मान्यता पाएगा।”

उन्होंने कहा कि आयुर्वेदिक शिक्षा और रिसर्च में बड़ी संभावनाएँ हैं क्योंकि ब्रिक्स देश अब अपने “स्वदेशी हेल्थ मॉडल” तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं।


📉 “कागज़ के भरोसे करियर नहीं बनता — स्किल्स और इनोवेशन जरूरी”

डॉ. शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आने वाले वर्षों में डिग्री की कीमत घटेगी और “स्किल बेस्ड” सिस्टम ही चलेगा।

“2030 के बाद कोई भी कंपनी 20 साल का जॉब गारंटी नहीं देगी। स्किल्स को लगातार अपग्रेड करना ही भविष्य की कुंजी है।”

उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे कॉलेज के दौरान ही टीम बनाकर छोटे स्तर पर स्टार्टअप या पायलट प्रोजेक्ट शुरू करें, ताकि पढ़ाई पूरी होते-होते वे “नो-प्रॉफिट-नो-लॉस” स्तर तक पहुँच जाएँ।


💬 “अब कोई बहाना नहीं — ब्रेड एंड बटर की चिंता इस जनरेशन को नहीं”

समापन में डॉ. शाह ने युवाओं से कहा —

“पिछली पीढ़ियों के पास जिम्मेदारियों का बहाना था, लेकिन इस जनरेशन के पास नहीं है। आज के युवाओं को बिजनेस, कंसल्टिंग या इनोवेशन में उतरना चाहिए। अगर 26 साल तक आप ब्रेक-ईवन पर भी पहुँच गए तो वही आपकी असली डिग्री है।”


🧭 निष्कर्ष

इस पॉडकास्ट के माध्यम से डॉ. अंकित शाह ने यह स्पष्ट किया कि आने वाला दशक शिक्षा और करियर दोनों के ढांचे को पलट देगा। जहाँ एक ओर पारंपरिक नौकरियों में अस्थिरता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर “स्किल, इनोवेशन और एंटरप्राइजिंग” भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा।


🗞️ प्रमुख बिंदु:

  • आईटी सेक्टर में अगले 10 साल ‘स्लैक पीरियड’ रहेगा
  • कोर इंजीनियरिंग, डिफेंस, स्पेस और मैन्युफैक्चरिंग में अवसर
  • डी-डॉलराइजेशन से भारत बनेगा जॉब हब
  • विदेशी यूनिवर्सिटीज की डिग्री का प्रभाव घटेगा
  • आयुष और स्वदेशी चिकित्सा का नया युग शुरू होगा
  • कॉलेज के दौरान ही बिजनेस/इनोवेशन मॉडल पर फोकस करें

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