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इस्लामाबाद में US-ईरान पीस टॉक: पहले दिन टकराव ज्यादा, समाधान दूर

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

सीजफायर के बाद शुरू हुई वार्ता में दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर अड़े, पाकिस्तान निभा रहा मध्यस्थ की भूमिका

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बाद शुरू हुई शांति वार्ता के पहले दिन ही साफ हो गया कि रास्ता आसान नहीं है। करीब चार घंटे चली शुरुआती बातचीत में दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहे, जिससे कूटनीतिक तनाव बना हुआ है। पाकिस्तान इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और इसे वैश्विक शांति के लिए “मेक या ब्रेक” पल बताया जा रहा है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा

वार्ता के दौरान सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सामने आया। ईरान इस रणनीतिक मार्ग पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है और किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं दिख रहा। वहीं अमेरिका इस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाए रखना चाहता है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस भी हुई, जिससे बातचीत का माहौल और गर्म हो गया।

नेताओं के बयानों से बढ़ा तनाव

वार्ता के समानांतर दोनों देशों के नेताओं के बयान भी सख्त रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि यदि ईरान नहीं माना तो गंभीर परिणाम होंगे। दूसरी ओर ईरान ने भी संकेत दिया कि वह अपने हितों से पीछे नहीं हटेगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे दुनिया के लिए निर्णायक क्षण बताया।

इसी बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी बयान देकर माहौल और तनावपूर्ण बना दिया। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ इजराइल की कार्रवाई जारी रहेगी, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है।

ईरान की मुख्य शर्तें क्या हैं?

ईरान ने समझौते के लिए कई अहम शर्तें रखी हैं। सबसे प्रमुख यह है कि वह अपना परमाणु कार्यक्रम बंद नहीं करेगा। इसके अलावा लेबनान पर इजराइली हमले रोकने, होर्मुज पर टोल वसूली जारी रखने और विदेशों में फंसी अपनी संपत्तियों को तुरंत बहाल करने की मांग की गई है।

ईरान की इन शर्तों को अमेरिका के लिए मानना आसान नहीं है, खासकर परमाणु कार्यक्रम और रणनीतिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर।

100 अरब डॉलर से ज्यादा फंड बना बड़ा मुद्दा

ईरान की विदेशों में फंसी संपत्तियां भी इस वार्ता का बड़ा केंद्र हैं। विभिन्न देशों में उसके करीब 100 से 120 अरब डॉलर तक फ्रीज हैं। इनमें दक्षिण कोरिया, चीन, इराक, कतर, जापान और यूरोपीय देशों में बड़ी रकम शामिल है।

यदि ये फंड ईरान को मिलते हैं, तो उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिल सकता है और क्षेत्रीय ताकत संतुलन बदल सकता है।

क्या निकलेगा कोई समाधान?

पहले दिन की बातचीत से यह स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच दूरी अभी काफी ज्यादा है। ईरान अपने आर्थिक और परमाणु अधिकारों पर अडिग है, जबकि अमेरिका रणनीतिक बढ़त बनाए रखना चाहता है।

हालांकि वार्ता जारी है और अगले दौर में कुछ नरमी की उम्मीद की जा रही है, लेकिन फिलहाल हालात यही संकेत देते हैं कि समझौते की राह लंबी और कठिन होगी।

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