हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :
देशभर में छात्रों के भविष्य से जुड़े नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद ने आखिरकार ऐसा राजनीतिक मोड़ लिया कि केंद्र सरकार को अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा। मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहला मौका माना जा रहा है जब किसी बड़े जनआंदोलन के दबाव में केंद्रीय मंत्री को पद छोड़ना पड़ा। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे छात्रों और युवाओं की बड़ी जीत करार दिया है।
पेपर लीक से शुरू हुआ विवाद

नीट-यूजी 2026 की परीक्षा 3 मई को आयोजित हुई थी, जिसमें लगभग 22 से 24 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे। परीक्षा के कुछ ही दिनों बाद सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आने लगे। आरोप लगे कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र टेलीग्राम और अन्य माध्यमों पर प्रसारित कर दिए गए थे। देशभर में विरोध शुरू हुआ और परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे। बढ़ते विवाद के बीच राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने 12 मई को परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा कराने का निर्णय लिया।
एक टिप्पणी से बना CJP का आंदोलन
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी चर्चा का विषय बनी, जिसमें उन्होंने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया था। यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई। इसी शब्द को आधार बनाकर अभिजीत दीपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ नाम से एक संगठन बनाने की घोषणा की। देखते ही देखते यह संगठन पेपर लीक के खिलाफ छात्रों की आवाज बन गया और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक आंदोलन फैलने लगा।
जंतर-मंतर से राष्ट्रीय आंदोलन तक
जून के पहले सप्ताह में CJP ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया। 6 जून को अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके सीधे प्रदर्शन में शामिल हुए। संगठन ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं—केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार के साथ नकल माफिया पर सख्त कार्रवाई।
20 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू हुआ। इसी बीच सरकार ने 21 जून को री-नीट परीक्षा आयोजित कराई। परीक्षा की निगरानी बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच हुई और प्रश्नपत्रों की सुरक्षित ढुलाई के लिए सेना के हेलीकॉप्टरों तक का इस्तेमाल किया गया। 16 जुलाई को री-नीट का परिणाम भी घोषित कर दिया गया।
आंदोलन को मिला व्यापक समर्थन

री-नीट के बाद आंदोलन को नया बल तब मिला जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठ गए। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू किया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को खुलकर समर्थन दिया। आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गया।
संसद मार्च, टकराव और बढ़ा दबाव
मानसून सत्र शुरू होने के साथ 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने ‘संसद चलो’ मार्च का आह्वान किया। दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। लाठीचार्ज और पथराव में कई छात्र तथा पुलिसकर्मी घायल हुए। अगले दिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च किया। सरकार की ओर से बातचीत के प्रयास हुए, लेकिन प्रदर्शन जारी रहा और अंततः कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।
सरकार की पहल और निर्णायक मोड़
23 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो संदेश जारी कर पेपर लीक पर सख्त कानून बनाने और फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा की। इसके बाद सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने आंदोलनकारियों से बातचीत शुरू की। 24 जुलाई को CJP और सरकार के बीच पहली औपचारिक वार्ता हुई। सरकार ने परीक्षा सुधार और अन्य मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया, लेकिन CJP शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अडिग रही।
25 जुलाई को दूसरे दौर की बातचीत प्रस्तावित थी, लेकिन उससे पहले ही धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही 74 दिनों तक चले इस आंदोलन ने अपना सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम हासिल कर लिया।
युवाओं की जीत या राजनीतिक संदेश?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद CJP ने इसे युवाओं की जीत बताते हुए कहा कि यह संघर्ष जवाबदेही की लड़ाई थी। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम सरकार के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जनभावनाओं को लंबे समय तक नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।













