जनगणना-2027 में पहली बार सभी जातियों की होगी गणना, पर वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था नहीं हुई तो 2011 जैसी उलझन दोहराने का खतरा
नई दिल्ली।हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़: आजादी के बाद पहली बार देश की सामान्य जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा सभी जातियों की गणना होने जा रही है। जनगणना-2027 की प्रश्नावली में जाति/जनजाति का नाम पूछने के लिए 10वां सवाल शामिल किया गया है। इसके साथ ही जातिगत आंकड़ों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों और विपक्ष की चिंता सिर्फ जातियों की गिनती को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि अलग-अलग नामों और स्थानीय पहचान को एक समान श्रेणी में कैसे रखा जाएगा।
दरअसल, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में जाति से जुड़े करीब 46 लाख नाम, उपजातियां, समानार्थी नाम, उपनाम, कुल और गोत्र दर्ज हुए थे। सरकार ने स्पष्ट किया था कि यह 46 लाख अलग-अलग जातियां नहीं थीं। एक ही सामाजिक समूह के अलग-अलग नाम दर्ज होने के कारण डेटा को वर्गीकृत करना बड़ी चुनौती बन गया था। इसी समस्या के समाधान के लिए 2015 में अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समूह बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में सरकार ने जाति संबंधी SECC-2011 का पूरा डेटा सार्वजनिक नहीं किया।
अब जनगणना-2027 में यही सवाल फिर सामने है। मसलन, कोई व्यक्ति अपनी जाति ‘कोइरी’, दूसरा ‘काछी’, तीसरा ‘मुराई’ और कोई ‘शाक्य’ या ‘सैनी लिखता है तो क्या इन्हें अलग-अलग जातियां माना जाएगा या किसी व्यापक सामाजिक श्रेणी में रखा जाएगा? यदि वर्गीकरण स्पष्ट नहीं हुआ तो एक ही सामाजिक समूह की आबादी कई नामों में बंट सकती है।
बिहार और तेलंगाना के जाति सर्वेक्षणों में जातिगत जवाबों को प्रशासनिक और सामाजिक श्रेणियों से जोड़ने के प्रयास किए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों लोगों की गणना में ऐसी व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण, सरकारी योजनाओं और संसाधनों में हिस्सेदारी को लेकर नई मांगें उठना तय माना जा रहा है। इसलिए जनगणना-2027 की सबसे बड़ी चुनौती जातियां गिनना नहीं, बल्कि उन्हें पारदर्शी, वैज्ञानिक और एक समान तरीके से वर्गीकृत करना होगी।
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