गलत नक्शों के कारण सीमा की पहचान में हुई चूक, जांच में नहीं पाए गए जिम्मेदार; तिब्बती शेरपा की सीख बनी जीवन का मंत्र
रुड़की। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने शनिवार को आईआईटी रुड़की के दीक्षांत समारोह में अपने शुरुआती खुफिया करियर का करीब 50 साल पुराना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि सिक्किम में तैनाती के दौरान सीमा क्षेत्र की निगरानी के लिए भेजी गई उनकी एक टीम चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की हिरासत में पहुंच गई थी। इस घटना के बाद उन्हें लगा था कि उनका करियर लगभग खत्म हो गया है।
डोभाल के मुताबिक, वह उस समय युवा आईपीएस अधिकारी थे और खुफिया क्षेत्र में नए थे। सिक्किम में उनकी जिम्मेदारियों में सीमा पर गतिविधियों पर नजर रखना और चीन की सैन्य गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाना शामिल था। एक मिशन के तहत टीम को सीमा क्षेत्र में भेजा गया। तय समय पर टीम के वापस नहीं लौटने पर चिंता बढ़ी। कई दिन गुजरने के बाद मुख्यालय से उन्हें जानकारी मिली कि टीम चीनी सेना की हिरासत में है।
डोभाल ने बताया कि इस घटनाक्रम से वह बेहद निराश हुए और उन्हें लगा कि अब उनका करियर समाप्त हो जाएगा। हालांकि, टीम के सदस्य बाद में रिहा होकर लौट आए। घटना की जांच में सामने आया कि टीम को उपलब्ध कराए गए नक्शों और स्केच में गलतियां थीं। इन्हीं खामियों के कारण सीमा की पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई थी। जांच में डोभाल को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।
इस मुश्किल दौर में खुफिया ब्यूरो में उनके साथ काम करने वाले एक बुजुर्ग तिब्बती शेरपा ने उन्हें महत्वपूर्ण सलाह दी। डोभाल के अनुसार, शेरपा ने कहा कि यह सब ‘मैप-रीडिंग’ का मामला है—कुछ लोग नक्शा सही पढ़ते हैं और कुछ गलत। वर्षों तक बर्फीले पहाड़ों में काम कर चुके शेरपा ने उन्हें जीवन के तीन सूत्र बताए—पहले यह समझो कि तुम कहां खड़े हो, फिर तय करो कि तुम्हें कहां जाना है और अंत में वहां पहुंचने का रास्ता पहचानो।
डोभाल ने कहा कि समय के साथ शेरपा की यह सीख उनके लिए सिर्फ पहाड़ों में रास्ता तलाशने का तरीका नहीं रही, बल्कि जीवन को समझने का नजरिया बन गई। दीक्षांत समारोह में उन्होंने छात्रों को कठिन परिस्थितियों से सीख लेने और लक्ष्य की दिशा स्पष्ट रखने का संदेश दिया।













