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UP : बिजली की दरों को लेकर अगले महीने हो सकता है कोई फैसला

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़: 12 मई : 2025,

लखनऊ।
प्रदेश में इस बार बिजली दरों को लेकर स्थिति थोड़ी अलग नजर आ रही है। खास बात यह है कि वर्ष 2025-26 के लिए बिजली कंपनियों ने दर बढ़ाने या घटाने का कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। नियामक आयोग अब स्वयं ही बिजली दरों का निर्धारण करेगा। जून 2025 में इस पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी।

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने पाॅवर काॅर्पोरेशन द्वारा सभी क्षेत्रीय विद्युत वितरण कंपनियों — पूर्वांचल, दक्षिणांचल, पश्चिमांचल, मध्यांचल, केस्को और नोएडा पावर कंपनी — के लिए दाखिल की गई वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही आयोग ने ट्रू-अप 2023-24 और वार्षिक प्रदर्शन समीक्षा 2024-25 को भी स्वीकृति दी है।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि मल्टी ईयर टैरिफ रेगुलेशन 2025 के अंतर्गत किसी भी कंपनी ने बिजली दरों से संबंधित कोई प्रस्ताव दाखिल नहीं किया है। इस कारण अब दरें बढ़ेंगी या घटेंगी, इसका निर्णय पूरी तरह से आयोग करेगा।

जनता की राय भी होगी अहम

आयोग ने निर्देश दिया है कि सभी कंपनियां तीन दिन के अंदर ARR से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करें। इसके बाद 21 दिन के भीतर उपभोक्ता अपनी आपत्तियां और सुझाव दे सकेंगे। आयोग जून माह में विभिन्न शहरों में जाकर आम जनता से बातचीत और सुनवाई करेगा।

कितनी है कंपनियों की जरूरत और अनुमानित बिक्री

पांचों प्रमुख वितरण कंपनियों की कुल वार्षिक राजस्व आवश्यकता लगभग ₹1,13,923 करोड़ आंकी गई है। सभी कंपनियां मिलकर करीब 1,33,779 मिलियन यूनिट बिजली बेचने का अनुमान रख रही हैं। हालांकि, लाइन हानियां और एटीएंडसी हानियों के आंकड़े अभी तक किसी भी कंपनी द्वारा दाखिल नहीं किए गए हैं। कुल मिलाकर बिजली वितरण व्यवस्था में लगभग ₹9,000 से ₹10,000 करोड़ का गैप बताया जा रहा है।


उपभोक्ताओं का ₹33,122 करोड़ लौटाएं कंपनियां: उपभोक्ता परिषद

उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने बिजली कंपनियों पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनियों पर उपभोक्ताओं के ₹33,122 करोड़ बकाया हैं। उन्होंने कहा कि जब तक यह राशि उपभोक्ताओं को नहीं लौटाई जाती, तब तक बिजली दरों में वृद्धि का कोई औचित्य नहीं है।
वर्मा ने मांग की है कि यह राशि हर माह के बिजली बिल में समायोजित कर उपभोक्ताओं को लौटाई जाए। उनका कहना है कि यदि यह धनराशि वापस की जाती है, तो बिजली दरों में कटौती की पूरी संभावना बनती है।


क्या कहता है कानून?

बिजली अधिनियम व नियामक प्रावधानों के अनुसार, यदि बिजली कंपनियां अपने खर्चों के आंकड़े, हानियों और प्रस्तावों को स्पष्ट रूप से पेश नहीं करतीं, तो नियामक आयोग स्वतंत्र रूप से दरों का निर्धारण कर सकता है। इस बार कंपनियों का निष्क्रिय रुख यह संकेत देता है कि वे दर वृद्धि को लेकर आश्वस्त नहीं हैं या वे नियामक की ओर से पहल की प्रतीक्षा में हैं।

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