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राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस की लगातार गिरावट: बिहार 2025 से लेकर 95 चुनावी हारों की पूरी कहानी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने कांग्रेस के लिए एक बार फिर बड़ा राजनीतिक झटका दे दिया। 61 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई। यह नतीजा सिर्फ एक राज्य में हार भर नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों में राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार कमजोर पड़ते चुनावी ग्राफ की ताज़ा कड़ी है। लगभग 20 सालों में कांग्रेस 95 चुनाव हार चुकी है, जिसने पार्टी के जनाधार और संगठन दोनों को गंभीर रूप से कमजोर किया है।

कांग्रेस की 95 हारें: गिरावट की लंबी कहानी

पिछले दो दशकों में कांग्रेस देश के अधिकांश बड़े राज्यों में चुनावी तौर पर पिछड़ती गई है। लोकसभा से लेकर विधानसभा तक, उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम, सभी क्षेत्रों में पार्टी या तो कमजोर पड़ी या चुनावी दौड़ से बाहर हो गई।

  • उत्तर प्रदेश में 2007 से 2025 तक लगातार पाँच विधानसभा चुनावों में गिरावट।
  • बिहार में 2005, 2010, 2020 और 2025 की हारें। 2025 की हार सबसे खराब।
  • गुजरात में चार लगातार चुनावों में हार, लेकिन संगठन खड़ा नहीं हो पाया।
  • मध्य प्रदेश/राजस्थान/छत्तीसगढ़ में चुनावी उतार-चढ़ाव के बावजूद स्थायी जीत नहीं।
  • उत्तर-पूर्व लगभग पूरी तरह हाथ से निकल चुका है।
  • कर्नाटक, केरल, असम जैसे पुराने गढ़ भी कमजोर पड़ चुके हैं।

लगातार 95 हारों का मतलब है कि पार्टी औसतन हर तीन महीने में एक चुनाव हार रही है। यह संकेत है कि कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र बेहद तेज़ी से सिमटा है।

कांग्रेस सबसे ज्यादा कहां हारी?

राहुल गांधी को सबसे अधिक झटके बड़े राज्यों से मिले।

  • उत्तर प्रदेश: कांग्रेस का सबसे कमजोर प्रदर्शन।
  • बिहार: 2025 में सिर्फ 1 सीट पर सिमटकर रिकॉर्ड निचला स्तर।
  • गुजरात: 15 साल से अधिक समय से विपक्ष के तौर पर भी स्थापित नहीं हो सकी।
  • मध्य भारत: 2018 के बाद कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा।
  • उत्तर-पूर्व: 2018 से 2024 के बीच कांग्रेस लगभग गायब।
कांग्रेस ने क्या खोया?
  • संगठनात्मक ढांचा कई राज्यों में निष्क्रिय।
  • क्षेत्रीय दलों का उभार—RJD, AAP, TMC, BJD, AIMIM ने कांग्रेस का वोट बैंक खाया।
  • चुनावी मशीनरी कमजोर—नेतृत्व सिर्फ नैरेटिव पर निर्भर।
  • युवा नेतृत्व में विश्वास की कमी।
  • जमीनी कैडर की अनुपस्थिति।

यह हकीकत बताती है कि पार्टी का संकट सिर्फ नेतृत्व का नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक संरचना के ढह जाने का है।

बिहार 2025: क्यों यह कांग्रेस के लिए टर्निंग पॉइंट है?

बिहार में कांग्रेस की हार महज संख्या की हार नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती राजनीतिक स्थिति का प्रतीक है।

  1. पारंपरिक वोट बैंक का टूटना
    सीमांचल और मिथिला में कांग्रेस का आधार AIMIM, RJD और BJP ने हथिया लिया।
  2. स्थानीय संगठन का अभाव
    जिले और ब्लॉक स्तर पर नेतृत्व लगभग नदारद रहा।
  3. महागठबंधन में कमजोर भूमिका
    कांग्रेस “ताकत” नहीं बल्कि “सपोर्टिंग पार्टनर” बनकर रह गई।
  4. ओबीसी और मुस्लिम वोटों का शिफ्ट
    यह वोट सीधे RJD और AIMIM की ओर गए।
  5. चार चुनावों से लगातार गिरावट
    2025 ने कांग्रेस को ऐतिहासिक न्यूनतम पर पहुँचा दिया।
क्या 95 हारें कांग्रेस के भविष्य का संकेत देती हैं?

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राहुल गांधी का मॉडल मुद्दों पर नैरेटिव बनाता है, लेकिन चुनाव जीतने वाली मशीनरी नहीं खड़ी कर पाता।
अगर कांग्रेस 2029 की लड़ाई लड़ना चाहती है, तो उसे बिहार जैसी हारों से सबक लेना होगा।

पार्टी को जमीनी कैडर, संगठन, प्रदेश नेतृत्व, गठबंधन रणनीति और चुनावी प्रबंधन, सबका व्यापक “रीबूट” करना होगा।

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