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युवा आंदोलनों का इतिहास और सबक- योगेश शर्मा

योगेश शर्मा
सामजिक व राजनितिक विश्लेषक

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

आज की नई पीढ़ी यानी जेनरेशन ज़ी सोशल मीडिया के माध्यम से वैश्विक स्तर पर जुड़ी हुई है। नेपाल में हाल ही में जो घटनाएँ हुईं, उन्हें महज़ अचानक भड़का आंदोलन नहीं कहा जा सकता। यह लंबे समय से जमा हो रहा जनाक्रोश था, जिसे सोशल मीडिया ने स्वर और सहारा दिया। भीड़ सड़कों पर उतरी, हिंसा हुई, सरकारी भवनों पर हमले हुए और अराजकता का माहौल दिखा। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब किसी देश ने युवा आंदोलनों का ऐसा दौर देखा हो।

भारत भी अतीत में तीन बड़े आंदोलनों से गुजरा है—दो बार पूर्ण विद्रोह और एक बार आंशिक। फर्क सिर्फ इतना था कि भारत को हर बार परिपक्व नेतृत्व मिला, जिसने युवाओं के जोश को सही दिशा देने का प्रयास किया।

पहला बड़ा विद्रोह आज़ादी की लड़ाई के दौरान हुआ। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ भारतीय युवा गुस्से से सड़कों पर उतरे। महात्मा गांधी के नेतृत्व ने इस गुस्से को अहिंसा और सत्याग्रह का रूप दिया। चौरी-चौरा जैसी घटनाओं में हिंसा भले हुई, लेकिन गांधी जी ने समय रहते आंदोलनों को रोककर यह सुनिश्चित किया कि युवा शक्ति अराजकता में न बदले। “भारत छोड़ो आंदोलन” इसका बड़ा उदाहरण है, जिसमें देशव्यापी आक्रोश को अहिंसक मार्गदर्शन मिला।

दूसरा युवा आंदोलन 1974 में हुआ, जिसका नेतृत्व ‘लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण ने किया। इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार और तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ नई पीढ़ी को एकजुट किया। इतना व्यापक जनसमर्थन सरकार के लिए चुनौती बना कि आपातकाल लागू करना पड़ा। लेकिन आज़ादी के बाद जिस तरह गांधी जी के विचारों की उपेक्षा हुई, उसी तरह जे.पी. आंदोलन के बाद सत्ता में आए नेताओं ने भी जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया।

तीसरा आंदोलन अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन दिल्ली की सड़कों पर युवाओं के विशाल जमावड़े के रूप में उभरा। सोशल मीडिया इस बार भी बड़ी ताक़त बना। लेकिन इस आंदोलन से निकले नेतृत्व ने अंततः सत्ता पाकर वही रास्ता चुना, जिसकी आलोचना वह पहले किया करता था। नतीजा यह हुआ कि जनता का भरोसा टूट गया और आंदोलन की आत्मा खो गई।

इन तीनों उदाहरणों से साफ है कि भारत में आंदोलनों को टिकाऊ दिशा परिपक्व नेतृत्व ने ही दी। नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका के विपरीत भारत में भीड़तंत्र पूरी तरह अराजकता में नहीं बदला क्योंकि गांधी, जे.पी. और अन्ना जैसे नेताओं ने युवाओं को राह दिखाने का प्रयास किया।

अब सवाल उठता है कि क्या नेपाल का यह नया आंदोलन कोई स्थायी बदलाव लाएगा? अनुभव कहता है कि शायद नहीं। सत्ता परिवर्तन होगा, चेहरे बदलेंगे, लेकिन सत्ता का चरित्र वही रह सकता है। नई व्यवस्था भी धीरे-धीरे पुराने ढर्रे पर लौट आती है।

इसलिए असली बदलाव तब संभव होगा जब आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित न रहकर व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करें। युवाओं का आक्रोश तभी सार्थक होगा जब उसे दूरदर्शी और ईमानदार नेतृत्व मिले। इतिहास यही सिखाता है कि बिना स्पष्ट दिशा और वैचारिक मजबूती के आंदोलन भले तात्कालिक हलचल पैदा करें, लेकिन दीर्घकालिक क्रांति नहीं ला पाते।

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