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श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज फॉर वुमेन में ‘विकसित भारत @2047’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

हिंदुस्तान मिरर न्यूज़ डेस्क, नई दिल्ली

दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज फॉर वुमेन के समाजशास्त्र विभाग द्वारा 18 फरवरी 2026 को “स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में विकसित भारत @2047 : चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से आए विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की और भारत के विकासात्मक भविष्य पर गहन विमर्श किया।

उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. नीलम गोयल ने स्वागत संबोधन देते हुए समावेशी और प्रगतिशील भारत के निर्माण में अकादमिक संवाद की महत्ता पर बल दिया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. रविंदर सिंह ने विषय-प्रस्तावना रखते हुए समकालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

प्रथम मुख्य वक्तव्य विवेकानंद केंद्र (उत्तर भारत) के उप प्रमुख डॉ. निखिल यादव द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने समकालीन समय में स्वामी विवेकानंद की राष्ट्रनिर्माण, युवा सशक्तिकरण और नैतिक नेतृत्व संबंधी दृष्टि की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। द्वितीय मुख्य वक्तव्य गांधी भवन, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त निदेशक डॉ. राजकुमार फलवारिया ने दिया, जिसमें ‘विकसित भारत @2047’ की दिशा में नीति, प्रगति और संभावनाओं पर महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि साझा की।

संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में 30 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए तथा 200 से अधिक प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की। सत्रों की अध्यक्षता डॉ. निखिल यादव और डॉ. अत्रयी साहा ने की, जबकि संचालन डॉ. अल्पना, डॉ. मनीष कुमार सिंह एवं डॉ. शाश्वत कुमार ने किया। उत्कृष्ट अकादमिक योगदान के लिए छह शोधपत्रों को ‘सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र प्रस्तुति’ प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।

समापन सत्र में विश्वविख्यात कवि गजेंद्र सोलंकी तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सह प्राध्यापिका डॉ. अत्रयी साहा ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए संगोष्ठी में हुए बौद्धिक विमर्श की सराहना की और 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में शिक्षा एवं शोध की भूमिका को रेखांकित किया।

उत्साहपूर्ण सहभागिता के साथ संगोष्ठी का सफल समापन हुआ, जिसने समाजशास्त्र विभाग की समालोचनात्मक चिंतन, अंतर्विषयक संवाद और राष्ट्र-केंद्रित अकादमिक पहलों के प्रति प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया।

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