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Somnath Temple भारत की सनातन आस्था, सांस्कृतिक गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। अरब सागर के तट पर स्थित यह मंदिर सदियों से हिंदू श्रद्धा का प्रमुख केंद्र रहा है। आज गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित इस मंदिर के पुनर्निर्माण को 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 11 मई 1951 को देश के प्रथम राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने इसका लोकार्पण किया था।
चंद्रदेव से जुड़ी है मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना कर यहां मंदिर का निर्माण कराया था। इसी कारण इसका नाम “सोमनाथ” पड़ा। शिव पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ को पहला स्थान दिया गया है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है।
कई बार टूटा, फिर भी अडिग रहा सोमनाथ
इतिहास के अनुसार वर्ष 1026 में विदेशी आक्रांता Mahmud of Ghazni ने सोमनाथ मंदिर पर हमला कर इसे लूटा और भारी संपत्ति लेकर चला गया। इसके बाद 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया। बाद के समय में भी मंदिर कई बार टूटता और बनता रहा। सन् 1783 में Ahilyabai Holkar ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाकर यहां फिर से पूजा-अर्चना शुरू कराई थी।
सरदार पटेल के संकल्प से हुआ पुनर्निर्माण
आजादी के बाद देश के प्रथम गृह मंत्री Vallabhbhai Patel ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। महात्मा गांधी की सहमति से मंदिर निर्माण के लिए जनता से धन एकत्र किया गया। इसके लिए सोमनाथ ट्रस्ट बनाया गया, जिसके अध्यक्ष केएम मुंशी बने। गुजरात की पारंपरिक सोमपुरा शैली में मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण किया गया।
अरब और ईरान तक थी ख्याति
प्राचीन काल में सोमनाथ को प्रभास पाटन कहा जाता था। अरब और ईरान के व्यापारी यहां व्यापार के लिए आते थे। मंदिर की समृद्धि और विशाल दान व्यवस्था के कारण इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली थी। कहा जाता है कि मंदिर के खर्च के लिए 10 हजार गांव जुड़े हुए थे।
अहिल्यादेवी का अमिट योगदान
Somnath Temple कई बार लूटा और तोड़ा गया, लेकिन इसकी आस्था कभी नहीं टूटी। Ahilyabai Holkar ने सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण कर उसके वैभव को फिर स्थापित किया। सनातन संस्कृति और धर्म रक्षा में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
हिंदू आस्था और स्वाभिमान का केंद्र
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है। सदियों के संघर्ष और आक्रमणों के बावजूद यह मंदिर आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
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