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समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग न बनने से त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टलने के आसार

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
अप्रैल–मई में प्रस्तावित चुनावों पर संकट, आरक्षण प्रक्रिया अधर में

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। राज्य में अप्रैल–मई के बीच पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं, लेकिन अब इनके टलने के संकेत मिल रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह अब तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न होना है। आयोग के बिना पंचायतों में ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया तय नहीं हो पा रही है, जिससे चुनावी तैयारियां प्रभावित हो रही हैं।

राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव चिन्ह, मतदान केंद्रों की सूची और अन्य तकनीकी तैयारियों में जुटा हुआ है। जारी मतदाता सूची के अनुसार प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 12 करोड़ 69 लाख मतदाता हैं। इसके बावजूद आरक्षण को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने से चुनाव की तारीखों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

सरकार और अफसरों के अलग-अलग दावे
पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर का दावा है कि पंचायत चुनाव तय समय पर ही कराए जाएंगे। उनका कहना है कि वह जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात कर आयोग के गठन को अंतिम रूप दिलाएंगे। राजभर का दावा है कि आयोग दो माह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप सकता है। हालांकि विभागीय अफसरों की राय इससे अलग है। अधिकारियों के अनुसार, यदि अगले माह भी आयोग गठित हो जाता है तो रिपोर्ट आने में कम से कम तीन माह लगेंगे, ऐसे में अप्रैल–मई में चुनाव कराना संभव नहीं होगा।

आरक्षण का गणित और आयोग की भूमिका
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 20.69 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.56 प्रतिशत है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इन्हीं अनुपातों में सीटें आरक्षित रहती हैं। ओबीसी की जनसंख्या जनगणना में शामिल नहीं थी, लेकिन 2015 के रैपिड सर्वे के अनुसार ग्रामीण आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 53.33 प्रतिशत पाई गई थी। कानून के तहत पंचायत चुनावों में ओबीसी के लिए अधिकतम 27 प्रतिशत आरक्षण तय है, जिसे समर्पित आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लागू किया जाना जरूरी है।

विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगाया है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता उदयवीर सिंह का कहना है कि योगी सरकार विधानसभा चुनावों से पहले पंचायत चुनाव नहीं कराना चाहती, क्योंकि इसका असर विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। उनका आरोप है कि सरकार आरक्षण का बहाना बनाकर पंचायत चुनावों को टाल रही है।

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