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कर्नाटक में महिलाओं को अब हर महीने मिलेगी पीरियड लीव, जानिए क्या कहते हैं पुरुष

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

कर्नाटक सरकार ने महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पीरियड लीव (Period Leave) को आधिकारिक रूप से मंजूरी दे दी है। इस निर्णय के तहत राज्य की सभी सरकारी और निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन का मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) मिलेगा। इसे महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और कार्यस्थल पर समानता की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

महिलाओं के लिए राहत, समाज के लिए जागरूकता का संदेश

सरकार का कहना है कि यह फैसला सिर्फ छुट्टी देने का नहीं, बल्कि महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संवेदनशीलता दिखाने का प्रयास है। लंबे समय से महिला संगठनों द्वारा यह मांग की जा रही थी कि मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और असुविधा को कार्यस्थल पर भी मान्यता दी जाए। अब सरकार ने यह कदम उठाकर महिलाओं को राहत दी है और समाज में इस विषय पर खुली चर्चा को प्रोत्साहित किया है।

पुरुषों का क्या कहना है?

इस फैसले को लेकर पुरुषों की राय भी दिलचस्प रही। गुरुग्राम के 25 वर्षीय कम्युनिकेशन प्रोफेशनल हरप्रतीक कहते हैं, “मैं इस फैसले का पूरी तरह समर्थन करता हूं। इसे बहुत पहले लागू किया जाना चाहिए था। इससे यह संदेश जाता है कि पीरियड्स कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।”
हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इस नीति के चलते कुछ कंपनियां महिलाओं को ‘कम मेहनती’ या ‘अधिक छुट्टी लेने वाली’ के रूप में देख सकती हैं। वहीं कई महिलाएं खुद भी हिचकिचाहट महसूस करती हैं कि कहीं छुट्टी लेने पर उनकी कार्यक्षमता पर सवाल न उठाया जाए।

किन राज्यों में पहले से है यह सुविधा?

भारत में सबसे पहले 1992 में बिहार सरकार ने महिलाओं को हर महीने दो दिन की पीरियड लीव का अधिकार दिया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में भी कुछ शर्तों के साथ यह सुविधा लागू की गई। कर्नाटक अब इस सूची में नया नाम जुड़ गया है। पहले बनी समिति ने सुझाव दिया था कि हर महीने 6 दिन की छुट्टी दी जाए, लेकिन फिलहाल सरकार ने इसे सालाना 12 दिन तय किया है।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल छुट्टी देना ही काफी नहीं है। जरूरी है कि कार्यस्थलों पर ऐसा माहौल बने, जहां महिलाएं अपने मासिक धर्म को लेकर शर्म या अपराधबोध महसूस न करें। जब पुरुष और महिलाएं दोनों इस मुद्दे को समान रूप से समझेंगे, तभी वास्तविक समानता संभव होगी।

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