हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ ✑ 24 मई : 2025
लखनऊ, उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों ‘डीएनए’ विवाद को लेकर गरमा गई है। सत्ताधारी भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच बयानबाजी अब सड़कों पर पोस्टर और होर्डिंग्स के रूप में सामने आ रही है। यह सारा विवाद उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच छिड़े तीखे राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन गया है।
विवाद की शुरुआत सपा के सोशल मीडिया सेल द्वारा डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से हुई थी। इस टिप्पणी में कथित तौर पर उनके ‘डीएनए’ पर सवाल उठाए गए थे, जो भाजपा खेमे को नागवार गुजरा। भाजपा कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व ने इस बयान की तीखी आलोचना की। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने सपा की इस टिप्पणी की कड़ी निंदा की।
ब्रजेश पाठक ने संयमित लेकिन स्पष्ट शब्दों में समाजवादी पार्टी को जवाब दिया, वहीं अखिलेश यादव ने पलटवार करते हुए इसे “कृष्ण के वंशजों का अपमान” बताया। उन्होंने ब्रजेश पाठक को अपने बयानों में ‘डीएनए’ शब्द का इस्तेमाल न करने की सलाह दी। हालांकि, पाठक और उनके समर्थकों ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया और अब इसे लेकर सड़कों पर खुलेआम सपा के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है।
राजधानी लखनऊ में जगह-जगह ‘उत्तर प्रदेश नागरिक परिषद’ और भाजपा समर्थक संगठनों द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स चर्चा का विषय बन गए हैं। इन होर्डिंग्स में समाजवादी पार्टी पर तुष्टिकरण की राजनीति, गुंडागर्दी और वर्ग विशेष के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया गया है। एक प्रमुख होर्डिंग पर लिखा है:
“नमाजवादियों की डीएनए रिपोर्ट आ गई…”
“वर्ग विशेष का तुष्टीकरण, गुंडागर्दी, गाली-गलौज… नमाजवादियों के डीएनए की आ गई रिपोर्ट।”
इन होर्डिंग्स में ब्रजेश पाठक के विकास कार्यों के लिए उनका आभार भी व्यक्त किया गया है। साथ ही, सपा के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई है।
ब्रजेश पाठक के समर्थन में भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि कई सहयोगी संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। इन संगठनों ने अखिलेश यादव से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि विपक्ष को इस प्रकार की भाषा और व्यक्तिगत टिप्पणी से बचना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में ‘डीएनए’ शब्द महज एक वैज्ञानिक या वंशानुगत पहचान का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि अब यह भाजपा के लिए एक प्रतीकात्मक राजनीतिक हथियार बन चुका है। इससे न केवल सपा को घेरा जा रहा है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए भी इसे एक भावनात्मक मुद्दा बनाया जा रहा है।

















