हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध के बीच इराक के प्रमुख कुर्द नेताओं मसूद बरजानी और बाफेल तलाबानी से फोन पर बातचीत की है। यह बातचीत अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच शुरू हुई सैन्य कार्रवाई के ठीक बाद हुई। सूत्रों के अनुसार, चर्चा संवेदनशील थी और इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। माना जा रहा है कि इस पहल के पीछे इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति भी शामिल है।
पर्दे के पीछे की रणनीति
सूत्रों का कहना है कि नेतन्याहू लंबे समय से कुर्द समूहों को ईरान के खिलाफ संभावित मोर्चे में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे। इजराइल के सीरिया, इराक और ईरान के कुर्द संगठनों के साथ पहले से सुरक्षा और खुफिया संबंध रहे हैं। हाल ही में व्हाइट हाउस में ट्रंप के साथ बैठक में नेतन्याहू ने कुर्दों की संभावित भूमिका और ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना पर चर्चा की थी।
ईरान युद्ध में कुर्दों की संभावित भूमिका
इराक-ईरान सीमा पर हजारों कुर्द लड़ाके तैनात हैं और वे कई रणनीतिक इलाकों पर नियंत्रण रखते हैं। इराक के कुर्दों के ईरान के कुर्द अल्पसंख्यकों से भी करीबी संबंध हैं। हाल ही में कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी ने आरोप लगाया कि ईरान ने उन पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। युद्ध शुरू होने से पहले पांच ईरानी-कुर्द समूहों ने गठबंधन बनाकर ईरान के खिलाफ संघर्ष का ऐलान भी किया था।
अमेरिका को क्यों है कुर्दों से उम्मीद?
2003 में Saddam Hussein के पतन के बाद उत्तरी इराक में कुर्दों को स्वायत्त क्षेत्र मिला। कुर्द लड़ाके ‘पेशमर्गा’ के नाम से जाने जाते हैं और उन्होंने ISIS के खिलाफ जमीनी लड़ाई में अहम भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये अनुभवी लड़ाके अमेरिका-इजराइल के हवाई हमलों को जमीनी समर्थन दे सकते हैं, जैसा 2001 में अफगानिस्तान में हुआ था।
तुर्की फैक्टर बना चुनौती
हालांकि सबसे बड़ी चुनौती तुर्की है। NATO सहयोगी तुर्की और कुर्द समूहों के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। ट्रंप ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन से भी बात की है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि युद्ध या उसके बाद ईरान में कुर्दों की वास्तविक भूमिका क्या होगी।
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