हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
नई दिल्ली: Supreme Court of India में जनहित याचिका (PIL) व्यवस्था को लेकर एक अहम बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार ने अदालत से PIL को समाप्त करने या इसमें बड़े बदलाव करने की मांग कर सभी को चौंका दिया है। इस मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है।
सरकार की दलील: अब बदल चुकी है व्यवस्था
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने दलील दी कि पिछले 50 वर्षों में PIL का मूल उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब देश में न्याय व्यवस्था पहले से अधिक पारदर्शी और सुलभ हो गई है।
सरकार का तर्क है कि National Legal Services Authority (NALSA) और जिला स्तर पर DALSA जैसी संस्थाएं जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सहायता दे रही हैं। साथ ही ई-फाइलिंग और डिजिटल सिस्टम ने आम लोगों की अदालत तक पहुंच आसान बना दी है।
PIL के दुरुपयोग पर चिंता
सरकार ने यह भी कहा कि आजकल कई PIL “प्रेरित” या निजी स्वार्थ से दायर की जा रही हैं, जिनका वास्तविक जनहित से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे मामलों से न्यायपालिका का समय भी प्रभावित होता है। इसलिए या तो PIL को खत्म किया जाए या इसे नए ढांचे में लागू किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या?
सुनवाई के दौरान CJI Justice Surya Kant ने माना कि अदालतें अब PIL मामलों को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हो गई हैं। उन्होंने कहा कि अब केवल उन्हीं याचिकाओं पर नोटिस जारी किया जाता है, जिनमें ठोस आधार होता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समय के साथ न्यायिक प्रणाली में बदलाव आया है और भविष्य में PIL की आवश्यकता कम हो सकती है।
क्या होगा आगे?
इस बहस का सीधा असर आम नागरिकों की न्याय तक पहुंच पर पड़ सकता है। PIL को कमजोर या खत्म करने का फैसला न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है।
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