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भारत बनाएगा 450 किमी रेंज वाला देसी सुपर रडार, हवाई सुरक्षा को मिलेगा नया कवच

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

नई दिल्ली: भारत अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने लॉन्ग रेंज सर्विलांस रडार (LRSR) के निर्माण के लिए देशी कंपनियों से Request for Information (RFI) जारी किया है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती देने के साथ-साथ आधुनिक युद्ध की चुनौतियों से निपटने में अहम भूमिका निभाएगी।

पुराने सिस्टम की जगह लेगा नया रडार
देश में अभी कई रडार सिस्टम 1970 के दशक से इस्तेमाल हो रहे हैं। नए LRSR का उद्देश्य इन पुराने सिस्टम को बदलकर सेना की निगरानी क्षमता को कई गुना बढ़ाना है। इससे दुश्मन की हर गतिविधि पर पहले से ज्यादा सटीक नजर रखी जा सकेगी।

एडवांस तकनीक से लैस होगा सिस्टम
इन रडार में 4-डायमेंशनल AESA तकनीक और देसी GaN (Gallium Nitride) सेमीकंडक्टर का उपयोग किया जाएगा, जिसे DRDO ने विकसित किया है। यह तकनीक रडार को अधिक शक्तिशाली, कम गर्म होने वाला और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से सुरक्षित बनाती है।

450 किमी तक निगरानी की क्षमता
नया रडार 450 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य का पता लगाने में सक्षम होगा और 40 किलोमीटर की ऊंचाई तक निगरानी रख सकेगा। इससे बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों के साथ-साथ स्टेल्थ फाइटर जेट को भी ट्रैक करना संभव होगा।

ड्रोन खतरों पर विशेष नजर
इस प्रणाली में X-बैंड रडार शामिल होगा, जो छोटे ड्रोन, क्वाडकॉप्टर और ड्रोन स्वार्म जैसे खतरों को पहचानने और ट्रैक करने में सक्षम होगा। हाल के युद्धों में ड्रोन की बढ़ती भूमिका को देखते हुए यह फीचर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कठिन इलाकों में भी तैनाती संभव
ये रडार पूरी तरह मोबाइल होंगे और वाहनों पर लगाए जाएंगे। इन्हें 5,000 मीटर तक की ऊंचाई, जैसे हिमालयी क्षेत्रों में भी तैनात किया जा सकेगा। साथ ही -40°C से +50°C तक के तापमान में भी यह बिना रुकावट काम करेंगे।

एयर डिफेंस नेटवर्क होगा मजबूत
नए रडार मौजूदा सिस्टम जैसे Arudhra और Rohini रडार के साथ मिलकर काम करेंगे। साथ ही प्रस्तावित Surya रडार के साथ इनका समन्वय भारत को आसमान में हर गतिविधि की स्पष्ट और समग्र तस्वीर देगा।

आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम
यह परियोजना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारत की रणनीतिक ताकत को भी मजबूत करेगी। आने वाले समय में यह सिस्टम पारंपरिक विमानों के साथ-साथ नए उभरते खतरों से निपटने में निर्णायक साबित होगा।

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