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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मदरस-तुल-उलूम की 150वीं वर्षगांठ पर भव्य समारोह, सर सैयद के शिक्षा मिशन को किया गया यादगार

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ ✑ 24 मई : 2025

अलीगढ़, 24 मई: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की सर सैयद अकादमी में आज एक ऐतिहासिक अवसर पर मदरस-तुल-उलूम की 150वीं स्थापना वर्षगांठ समारोह बड़े ही हर्षोल्लास के साथ आयोजित किया गया। यह वही संस्थान है जिसकी नींव 24 मई 1875 को सर सैयद अहमद खान ने एक छोटे से मदरसे के रूप में रखी थी और जो बाद में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (1877) और फिर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।

इस अवसर पर आयोजित समारोह में शिक्षा, समाज और इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई और सर सैयद के बहुआयामी योगदान को स्मरण किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल अतीत को श्रद्धांजलि देना नहीं था, बल्कि एएमयू की समावेशी और प्रगतिशील शैक्षणिक परंपरा को आगे बढ़ाने के संकल्प को दोहराना भी था।

मुख्य अतिथि फैज अहमद किदवई ने साझा की ऐतिहासिक यात्रा

मुख्य अतिथि फैज अहमद किदवई, आईएएस, महानिदेशक, नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA), भारत सरकार और एएमयू के पूर्व छात्र ने अपने उद्बोधन में मदरस-तुल-उलूम से एमएओ कॉलेज और फिर एएमयू बनने की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “हम तब तक एएमयू की महानता को नहीं समझ सकते, जब तक हम उस छोटे से मदरसे की अहमियत नहीं पहचानते जिसने इसकी नींव रखी।” उन्होंने बताया कि यह केवल एक संस्थान का विकास नहीं, बल्कि एक विचारधारा का विस्तार था – शिक्षा के माध्यम से समाज का उत्थान।

किदवई ने एमएओ कॉलेज की शैक्षणिक उत्कृष्टता की सराहना करते हुए बताया कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर अलीगढ़ में पढ़ाने आते थे, जिससे ज्ञान और संस्कृति का समृद्ध आदान-प्रदान होता था। उन्होंने 1857 के विद्रोह के बाद उत्पन्न परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय मुस्लिम समुदाय प्रशासन, शिक्षा और समाज में हाशिये पर चला गया था और सर सैयद ने इस स्थिति को बदलने का बीड़ा उठाया।

शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व का महत्व

किदवई ने अपने वक्तव्य में शिक्षा और नेतृत्व के बीच समानता को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जैसे विमानन क्षेत्र में तकनीकी, सामाजिक और नैतिक संतुलन आवश्यक है, वैसे ही शिक्षा में भी यही संतुलन जरूरी है। उन्होंने ‘अलीगढ़ की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी शिक्षा भावना’ की सराहना करते हुए कहा कि यही भावना हमें आज के सामाजिक-राजनीतिक संकटों से उबरने में मदद करती है।

कुलपति प्रो. नइमा खातून ने सर सैयद की दृष्टि को बताया आज भी प्रासंगिक

समारोह की अध्यक्षता करते हुए एएमयू की कुलपति प्रो. नइमा खातून ने 24 मई 1875 को मदरस-तुल-उलूम की स्थापना को एक क्रांतिकारी कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह स्थापना केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं थी, बल्कि उस समय के समाज के लिए आत्मसम्मान, गरिमा और सशक्तिकरण का संदेश थी।

उन्होंने कहा, “सर सैयद चाहते थे कि अलीगढ़ एक ऐसा स्थान बने जहां पूर्व का सांस्कृतिक ज्ञान और पश्चिम की वैज्ञानिक सोच का संगम हो।” उन्होंने सर सैयद के विचार ‘पालने से कब्र तक ज्ञान प्राप्त करो’ को उद्धृत करते हुए शिक्षा को नैतिक जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्य बताया।

कुलपति ने यह भी घोषणा की कि मदरस-तुल-उलूम की 150वीं वर्षगांठ को एक स्मृति-वर्ष के रूप में मनाया जाएगा, जिसमें पूरे वर्ष भर विभिन्न सांस्कृतिक, शैक्षणिक और साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

सम्माननीय अतिथियों के विचार

समारोह में मानद अतिथि सहकुलपति प्रो. मोहम्मद मोसिन खान ने कहा कि मदरस-तुल-उलूम की यात्रा शिक्षा की अनुकूलनशीलता और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में नेतृत्व की क्षमता का प्रतीक है।
मानद अतिथि प्रो. जकिया सिद्दीकी ने विशेष रूप से एएमयू की यात्रा में महिला शिक्षा और महिला योगदान को रेखांकित किया और कहा कि नारी शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संस्था को समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सर सैयद की विरासत को किया गया सम्मानित

कार्यक्रम की शुरुआत सर सैयद अकादमी के निदेशक प्रो. शफी किदवई द्वारा हुई, जिन्होंने मदरस-तुल-उलूम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला और सर सैयद की वैश्विक दृष्टि को रेखांकित किया। उन्होंने मसूद परिवार के सदस्यों, शेहरजाद मसूद और शाहरनाज मसूद को उनकी पारिवारिक धरोहर को एएमयू को सौंपने के लिए धन्यवाद दिया।

इस अवसर पर फिरोज नकवी द्वारा रचित पुस्तक “सर सैयद इन आगरा” का विमोचन भी किया गया, जिसमें सर सैयद के प्रारंभिक प्रयासों और आगरा में उनके कार्यों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

कार्यक्रम का समापन

समारोह का संचालन श्री सैयद हुसैन हैदर ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मोहम्मद शाहिद, डिप्टी डायरेक्टर, सर सैयद अकादमी ने प्रस्तुत किया।

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