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155 मिमी तोप के गोलों की वैश्विक कमी में भारत बना बड़ा उत्पादक और निर्यातक

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

यूक्रेन-रूस युद्ध ने उजागर की आर्टिलरी संकट की हकीकत
इस समय दुनिया भर में 155 मिमी आर्टिलरी शेल्स (तोप के गोले) की भारी कमी देखी जा रही है। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इस संकट को और गहरा कर दिया। युद्ध के दौरान रूस रोजाना अनुमानित 5,000 से 10,000 गोले यूक्रेनी ठिकानों पर दाग रहा था। वहीं यूक्रेन को अपने नाटो समर्थक देशों से मिले सीमित स्टॉक्स पर निर्भर रहना पड़ा। यूरोप के कई देशों ने अपने भंडार से गोले यूक्रेन को दिए, जिससे उनकी अपनी तैयारियों पर असर पड़ा।

नाटो स्टैंडर्ड 155 मिमी और भारत की अहम भूमिका
155 मिमी गोला नाटो देशों का मानक (स्टैंडर्ड) साइज है और भारत की अधिकांश स्वदेशी तोपें भी इसी कैलिबर का उपयोग करती हैं। यही कारण है कि भारत इस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में तेजी से एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है। हाल के महीनों में भारत से यूरोपीय देशों को भेजे गए गोलों को लेकर रूस ने आपत्ति भी जताई थी। जांच में सामने आया कि भारत ने गोले बेल्जियम को निर्यात किए थे, जिन्हें बाद में बेल्जियम ने यूक्रेन भेज दिया।

वैश्विक उत्पादन क्षमता: रूस, चीन और पश्चिम
रूस पहले लगभग 4 लाख गोले सालाना बनाता था, जिसे उसने बढ़ाकर करीब 45 लाख तक कर लिया है। यह क्षमता अमेरिका और यूरोप की संयुक्त उत्पादन क्षमता से भी अधिक मानी जाती है। चीन की उत्पादन क्षमता भी 10 से 15 लाख गोले सालाना आंकी जाती है और वह भी इसे तेजी से बढ़ा सकता है।

भारत का बढ़ता उत्पादन और निजी कंपनियों की एंट्री
भारत अब सालाना 10 लाख से अधिक 155 मिमी गोलों का उत्पादन कर रहा है। खास बात यह है कि अब इस क्षेत्र में निजी कंपनियां भी तेजी से आगे आ रही हैं। आर्टिलरी गोले का सबसे अहम हिस्सा उसका मेटल शेल होता है, जिसमें बाद में बारूद और फ्यूज लगाया जाता है।

भारत में शेल निर्माण की बड़ी योजनाएं

  • सुनीता टूल्स: मार्च 2028 तक 3.6 लाख शेल सालाना
  • गुड लक इंडिया: पहले से 1.5 लाख शेल सालाना
  • बालू फोर्ज: मार्च 2028 तक 3.5 लाख शेल सालाना
  • तिरुपति फोर्ज: 2028 तक 2.4 लाख शेल सालाना
  • NIBE: मार्च 2027 तक 1.5 लाख शेल
  • रिलायंस (अनिल अंबानी ग्रुप): मार्च 2027 तक 2.5 लाख शेल

इसके अलावा अदाणी समूह, सरकारी कंपनियां और जर्मनी की राइनमेटल जैसी दिग्गज यूरोपीय कंपनियां भी भारत में आर्टिलरी शेल के प्लांट लगा रही हैं।

‘Gods of Artillery’ क्यों कहलाता है भारत
बढ़ती उत्पादन क्षमता, तकनीकी कौशल और वैश्विक मांग के बीच भारत को दुनिया की सेनाएं यूं ही “Gods of Artillery” नहीं कहतीं। आने वाले वर्षों में भारत इस क्षेत्र में वैश्विक सप्लाई हब बनता दिख रहा है।

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