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फर्टिलाइजर बना नया जियोपॉलिटिकल हथियार, भारत की खेती पर बढ़ा वैश्विक संकट का साया

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :

रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की नीति और पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ा रहे चिंता

नई दिल्ली। दुनिया में अब केवल तेल और गैस ही नहीं, बल्कि उर्वरक (फर्टिलाइजर) भी वैश्विक राजनीति का रणनीतिक हथियार बनता जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान पर प्रतिबंध और चीन की निर्यात नीति ने खाद की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। इसका असर भारत जैसे कृषि प्रधान देशों पर भी पड़ सकता है, जो कई जरूरी उर्वरकों और कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं।

कुछ देशों के हाथों में संसाधनों का नियंत्रण

यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस, फॉस्फेट रॉक, पोटाश और सल्फर जैसे संसाधनों की अहम भूमिका होती है। रूस और बेलारूस पोटाश के बड़े निर्यातक हैं, चीन फॉस्फेट आधारित उर्वरकों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, जबकि सऊदी अरब और कतर अमोनिया व यूरिया उत्पादन में महत्वपूर्ण हैं। मोरक्को के पास दुनिया का सबसे बड़ा फॉस्फेट भंडार है। ऐसे में किसी भी देश में युद्ध, प्रतिबंध या निर्यात रोक का असर पूरी दुनिया की खाद आपूर्ति पर पड़ता है।

सरकार का दावा- खाद की पर्याप्त उपलब्धता

केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि खरीफ 2026 सीजन में देश में यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीकेएस की उपलब्धता मांग से अधिक रही। सरकार के अनुसार यूरिया की उपलब्धता 174.47 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि आवश्यकता 120.16 लाख मीट्रिक टन थी। डीएपी, एमओपी और एनपीकेएस का भी पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। साथ ही नई निवेश नीति-2012 के तहत स्थापित छह नए यूरिया संयंत्रों से घरेलू उत्पादन बढ़ा है।

जमीन पर अलग तस्वीर

सरकारी दावों के बावजूद हाल के दिनों में कई राज्यों में किसानों को खाद के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। कई स्थानों पर रात से लाइन लगाने की खबरें सामने आईं, जिससे वितरण व्यवस्था पर सवाल उठे।

भारत के लिए क्यों बढ़ा खतरा?

भारत यूरिया का बड़ा हिस्सा स्वयं बनाता है, लेकिन डीएपी, एमओपी, फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट और कुछ अमोनिया के लिए आयात पर निर्भर है। वैश्विक आपूर्ति में बाधा आने पर खाद महंगी हो सकती है, सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है, सप्लाई में देरी, कालाबाजारी और फसलों की लागत बढ़ने जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव लंबा चला तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

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