हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :
तेल संकट, जियोपॉलिटिकल तनाव और ग्लोबल ट्रेड की अनिश्चितता के बावजूद पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन; खपत, निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर बने मजबूती के आधार
नई दिल्ली। तेल की कीमतों में उछाल, पश्चिम एशिया में तनाव, सप्लाई चेन में रुकावट और वैश्विक व्यापार को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। अप्रैल-जून तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। यह RBI के 7 फीसदी के अनुमान और रॉयटर्स पोल के 7.1 फीसदी के औसत अनुमान से काफी अधिक है। बाजार के कई अनुमान भी करीब 7.3 फीसदी के आसपास थे। ऐसे में 7.8 फीसदी की वृद्धि ने उन आशंकाओं को पीछे छोड़ दिया, जिनमें बाहरी दबावों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार कमजोर पड़ने की संभावना जताई जा रही थी।
तेल संकट से लेकर कमजोर वैश्विक मांग तक थीं कई चुनौतियां
वित्त वर्ष की शुरुआत ऐसे समय में हुई जब पश्चिम एशिया का तनाव भारत के लिए बड़ी आर्थिक चिंता बन गया था। भारत कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है और मध्य पूर्व से होने वाली आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर ऊर्जा लागत, महंगाई और आयात बिल पर पड़ सकता है। शिपिंग रूट में रुकावट और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर खतरे ने ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ाई थी।
महंगे ईंधन से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ने, व्यापार घाटा बढ़ने तथा परिवारों की खर्च करने की क्षमता घटने का खतरा था। दूसरी ओर, जियोपॉलिटिकल तनाव और वैश्विक व्यापार में सुस्ती से भारतीय निर्यात पर दबाव आने की आशंका थी। निजी निवेश को लेकर भी सवाल थे कि अनिश्चित वैश्विक माहौल में कंपनियां नई फैक्ट्रियों, डेटा सेंटर, बिजली परियोजनाओं और औद्योगिक क्षमता पर कितना खर्च करेंगी। मानसून को लेकर चिंता ने ग्रामीण मांग पर भी आशंकाएं पैदा की थीं।
खपत ने दिखाया दम, निवेश में जोरदार उछाल
GDP के आंकड़ों की खास बात यह रही कि विकास के लगभग सभी प्रमुख इंजन एक साथ मजबूत दिखाई दिए। पहली तिमाही में निजी खपत 7.1 फीसदी बढ़ी, जो एक साल पहले की 6.8 फीसदी वृद्धि से ज्यादा है। ऊंची ऊर्जा कीमतों के बावजूद वाहनों की बिक्री, क्रेडिट ग्रोथ, टैक्स राहत और GST को तर्कसंगत बनाने जैसे कदमों ने घरेलू मांग को सहारा दिया।
निवेश के मोर्चे पर तस्वीर और मजबूत रही। ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन में 11.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई और GDP में इसकी हिस्सेदारी एक-तिहाई से ऊपर पहुंच गई। यह संकेत देता है कि निवेश की रफ्तार अब केवल सरकारी खर्च तक सीमित नहीं रह गई है। डेटा सेंटर, बिजली, मेटल और औद्योगिक क्षमता जैसे क्षेत्रों में निजी निवेश बढ़ने के संकेत मिले हैं।
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर ने संभाली कमान
महंगी ऊर्जा और इनपुट लागत के दबाव के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने 9.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। कंस्ट्रक्शन में 7.7 फीसदी और यूटिलिटीज में 8.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। माइनिंग में कमजोरी के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र की कुल वृद्धि 7.7 फीसदी रही।
सर्विस सेक्टर अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बना रहा। इसमें करीब 10 फीसदी की वृद्धि हुई। फाइनेंशियल, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सर्विसेज में 12.1 फीसदी का विस्तार दर्ज किया गया, जबकि ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन में 8.5 फीसदी की वृद्धि हुई। मजबूत क्रेडिट ग्रोथ और IT व प्रोफेशनल सर्विसेज की मांग ने इस प्रदर्शन को सहारा दिया।
एक्सपोर्ट ने भी अनुमान को दिया झटका
वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद निर्यात में भारी गिरावट नहीं आई। इसके बजाय एक्सपोर्ट में करीब 12 फीसदी की वृद्धि हुई। सर्विसेज एक्सपोर्ट में तेजी रही, जबकि मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट भी मजबूत बने रहे। दूसरी ओर, इंपोर्ट में 1.1 फीसदी की गिरावट आई, जिससे नेट एक्सपोर्ट का योगदान बेहतर हुआ। कृषि क्षेत्र में 3.6 फीसदी की वृद्धि रही और वहां वह बड़ा नकारात्मक झटका नहीं दिखा, जिसकी आशंका जताई जा रही थी।
इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश बना बड़ा सहारा
जानकारों के मुताबिक भारत की मौजूदा मजबूती के पीछे कई वर्षों से जारी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की अहम भूमिका है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स, बिजली और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में सरकारी निवेश ने मांग पैदा करने के साथ अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता को भी मजबूत किया है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में केंद्र सरकार का कैपिटल खर्च 18.6 फीसदी बढ़ा। 2014-15 के बाद से सालाना कैपिटल खर्च करीब छह गुना बढ़कर लगभग 12 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
इसके साथ बैंकिंग और कॉरपोरेट बैलेंस शीट की बेहतर स्थिति भी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से निपटने में मदद कर रही है। बैंकों में बैड लोन कम हुए हैं, कॉरपोरेट लेवरेज में सुधार आया है और क्रेडिट ग्रोथ बनी हुई है। इससे कंपनियों और वित्तीय संस्थानों की निवेश तथा कर्ज देने की क्षमता मजबूत हुई है।
आगे की राह में चुनौतियां बरकरार
7.8 फीसदी की पहली तिमाही की वृद्धि ने वित्त वर्ष 2027 के पूरे साल के ग्रोथ आउटलुक को लेकर उम्मीदें बढ़ा दी हैं। हालांकि असली परीक्षा यह होगी कि निजी निवेश की रफ्तार कितनी देर तक कायम रहती है। डेटा सेंटर, बिजली, मैन्युफैक्चरिंग और औद्योगिक क्षमता में निवेश लगातार बढ़ता है तो सरकारी और निजी निवेश मिलकर टिकाऊ विकास का आधार तैयार कर सकते हैं।
घरेलू खपत भी आगे महत्वपूर्ण रहेगी। टैक्स राहत, कर्ज की उपलब्धता और नियंत्रित महंगाई मांग को सहारा दे सकती है, लेकिन लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें परिवारों की खरीद क्षमता पर दबाव डाल सकती हैं। वैश्विक ब्याज दरें, व्यापार प्रतिबंध, जियोपॉलिटिकल तनाव, ऊर्जा कीमतें और दुनिया की मांग की स्थिति भारत के लिए प्रमुख बाहरी जोखिम बने रहेंगे। मौसम और खाद्य कीमतों से जुड़े जोखिम भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।
इसलिए 7.8 फीसदी की एक तिमाही की वृद्धि को बड़ी उपलब्धि मानने के बावजूद इसे पूरी अर्थव्यवस्था की स्थायी तस्वीर नहीं माना जा सकता। रोजगार की गुणवत्ता, उत्पादकता, मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धात्मकता और लगातार निजी निवेश जैसी चुनौतियां अभी भी सामने हैं। फिर भी तेल की कीमतों में उछाल, जियोपॉलिटिकल संघर्ष, सप्लाई चेन की बाधाओं और वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता के बीच 7.8 फीसदी की वृद्धि यह संकेत जरूर देती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को पहले की तुलना में अधिक मजबूती से झेलने की स्थिति में पहुंची है।
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