हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :
2014 से 2024 के बीच 805 जनप्रतिनिधियों ने बदली पार्टी, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में नए और प्रभावी दलबदल विरोधी कानून की मांग उठाई।
नई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ रहे राजनीतिक दलबदल को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। 2014 से 2024 के बीच देशभर में 805 सांसद और विधायक पार्टी बदल चुके हैं। यानी औसतन हर साल 80 से अधिक जनप्रतिनिधियों ने दल बदला। वहीं, वर्ष 2026 में अब तक 96 सांसद और विधायक अपनी पार्टी छोड़ चुके हैं। इन आंकड़ों के बीच कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून की समीक्षा और इसे अधिक प्रभावी बनाने की मांग उठाई है।
मनीष तिवारी ने 20 जुलाई को लोकसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर दलबदल के बढ़ते मामलों पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की। उनका कहना है कि मौजूदा दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक अवसरवाद और बड़े पैमाने पर होने वाले दल परिवर्तन को रोकने में पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हो रहा है। उन्होंने ऐसा नया कानून बनाने की वकालत की, जो राजनीतिक अस्थिरता पर रोक लगाए, लेकिन वैचारिक असहमति के लिए लोकतांत्रिक गुंजाइश भी बनाए रखे।
भारत में दलबदल विरोधी कानून 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू किया गया था। इसके अनुसार यदि कोई सांसद या विधायक पार्टी छोड़ता है या पार्टी के व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति के अधिकार क्षेत्र में होता है।
विभिन्न राजनीतिक अध्ययनों और एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2020 के बीच 433 सांसद और विधायक दल बदलकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरे। इनमें 405 विधायक और 28 सांसद शामिल थे। इस दौरान सबसे अधिक 182 विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए, जबकि सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ।
मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में दलबदल के कारण सरकारें गिर चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा कानून में मौजूद खामियों के कारण दल बदल की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में संसद में शुरू हुई यह बहस भविष्य में दलबदल विरोधी कानून में बड़े बदलाव की दिशा तय कर सकती है।













