हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:
- बाल संरक्षण कानूनों के उल्लंघन पर अदालत की कड़ी टिप्पणी
- पूरे देश के लिए SOP जारी करने का निर्देश
- सिस्टम की नाकामी पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए नाबालिग के अधिकारों के उल्लंघन को बेहद चिंताजनक बताया है। मामला आगरा की केंद्रीय जेल से जुड़ा है, जहां एक नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ रखा गया था। अदालत ने इसे न केवल बाल संरक्षण कानूनों का उल्लंघन माना, बल्कि संवैधानिक अधिकारों पर भी सीधा हमला बताया।
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट कहा कि यह घटना सिस्टम की गंभीर विफलता को दर्शाती है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित नाबालिग को पहले ही नाबालिग घोषित किया जा चुका था, इसके बावजूद अधिकारियों की लापरवाही, समन्वय की कमी और असंवेदनशील रवैये के कारण उसे वयस्क कैदियों के बीच रखा गया।
कानून के खिलाफ और अमानवीय कदम
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ जेल में रखना पूरी तरह गैरकानूनी है। यह न केवल जुवेनाइल जस्टिस कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की भी अनदेखी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
देशभर के लिए SOP जारी करने का आदेश
सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित न रहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर मानते हुए सभी राज्यों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि इस SOP को हर राज्य में लागू किया जाए ताकि भविष्य में किसी भी नाबालिग के साथ ऐसा अन्याय न हो। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले की निगरानी जारी रखेगा।
मुआवजा देने का फैसला
अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पीड़ित नाबालिग को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्णय लिया है। इसे पीड़ित के अधिकारों के हनन के प्रति आंशिक न्याय के रूप में देखा जा रहा है।
यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बाल अधिकारों की सुरक्षा को लेकर अभी और सख्ती तथा जागरूकता की आवश्यकता है।
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