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जंग अभी बाकी: संसद से सड़क तक ‘नारी शक्ति’ की लड़ाई तेज

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज:

नई दिल्ली। महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण पास नहीं हो सका, लेकिन इसके साथ ही देश की राजनीति में एक नई बहस और संघर्ष की शुरुआत हो गई है। संसद में जोरदार बहस और आरोप-प्रत्यारोप के बाद अब यह मुद्दा सड़क तक पहुंचने जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुट गए हैं।

संसद में नंबर गेम में चूकी सरकार

दो दिन चली चर्चा के बाद जब वोटिंग हुई तो बिल के समर्थन में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी 352 वोट नहीं मिल सके। इस तरह सरकार 54 वोट से पीछे रह गई और विधेयक गिर गया।
हालांकि बहस के दौरान ही संकेत मिल गए थे कि सरकार के लिए आवश्यक संख्या जुटाना आसान नहीं होगा। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के भाषणों में भी इस बात की झलक दिखी थी।

सत्ता बनाम विपक्ष: आरोपों की जंग

बिल को लेकर सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर महिला और ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगाया। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को निशाने पर लेते हुए कहा कि इतिहास में इन दलों ने ओबीसी और महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी की है। उन्होंने परिसीमन के मुद्दे पर भी विपक्ष को घेरा और कहा कि इसका विरोध करना अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों के खिलाफ है।

वहीं विपक्ष ने इस बिल को चुनावी रणनीति करार दिया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है और देश का चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने ओबीसी आरक्षण और जाति जनगणना को लेकर भी सरकार की नीयत पर सवाल उठाए।

प्रदर्शन की तैयारी: सड़क पर उतरेगी सियासत

बिल गिरने के तुरंत बाद संसद परिसर में एनडीए की महिला सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन मकर द्वार से शुरू हुआ और विपक्ष के खिलाफ तीखे नारे लगाए गए।
अब बीजेपी ने ऐलान किया है कि 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। पार्टी कार्यकर्ता इंडिया गठबंधन के नेताओं के घरों के बाहर प्रदर्शन करेंगे और महिलाओं के अधिकारों को लेकर जनसमर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे।

महिला सशक्तिकरण या चुनावी रणनीति?

पूरे घटनाक्रम में एक बात साफ नजर आई कि यह सिर्फ एक विधेयक की लड़ाई नहीं, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई भी है। दोनों पक्ष महिलाओं के हितों की बात करते हुए अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे को मजबूत करने में लगे हैं।
अमित शाह ने बीजेपी की महिला मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं को सिर्फ आरक्षण नहीं, बल्कि नेतृत्व के अवसर भी देती है। वहीं राहुल गांधी ने कहा कि सरकार इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए कर रही है।

बहस के दौरान हंगामा और टकराव

लोकसभा में चर्चा के दौरान कई बार माहौल गरमा गया। राहुल गांधी के भाषण के दौरान सत्ता पक्ष ने कई बार आपत्ति जताई। खासकर जब उन्होंने एक उदाहरण के जरिए सरकार पर निशाना साधा, तो केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और उनसे बयान वापस लेने की मांग की।

बिल गिरा, लेकिन मुद्दा जिंदा

महिला आरक्षण विधेयक भले ही इस बार पास नहीं हो पाया हो, लेकिन इससे जुड़ा मुद्दा अब और ज्यादा राजनीतिक रूप ले चुका है। संसद से निकलकर यह बहस अब जनता के बीच पहुंचेगी, जहां राजनीतिक दल महिलाओं के समर्थन के लिए खुलकर मैदान में उतरेंगे।
आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है और यह तय करेगा कि ‘नारी शक्ति’ के नाम पर किसे जनता का भरोसा मिलता है।

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