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ट्रंप का टैरिफ बम: विदेशी जेनेरिक दवाओं पर पहले 2 साल राहत, फिर 200% तक शुल्क की तैयारी

हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :

नई अमेरिकी नीति से भारत के फार्मा निर्यात पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ने की आशंका, कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन बढ़ाने की चुनौती

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी जेनेरिक दवाओं के आयात को लेकर नई टैरिफ नीति की घोषणा की है। इसके तहत अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर शुरुआती दो वर्षों तक कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगेगा, लेकिन इसके बाद पहले 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जाएगा। इस कदम का उद्देश्य अमेरिका में दवाओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और भारत व चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करना है।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर कहा कि यह नीति अमेरिका में दवा निर्माण उद्योग को मजबूत करने के लिए बनाई गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पेटेंट आधारित और नई (इनोवेटिव) दवाओं पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी। अमेरिकी FDA के अनुसार, अमेरिका में उपयोग होने वाली 90 प्रतिशत से अधिक दवाएं जेनेरिक हैं।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत को दुनिया की “फार्मेसी” कहा जाता है और अमेरिकी बाजार भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है। अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली करीब 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं। शुरुआती दो वर्षों तक 0 प्रतिशत टैरिफ रहने से भारतीय कंपनियों को तत्काल राहत मिलेगी और निर्यात सामान्य रूप से जारी रह सकेगा।

हालांकि, दो साल बाद 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत टैरिफ लागू होने पर भारतीय दवाएं अमेरिकी बाजार में महंगी हो जाएंगी। इससे सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन और अरबिंदो फार्मा जैसी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए भारतीय कंपनियों को अमेरिका में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करनी पड़ सकती हैं या स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी करनी होगी।

भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार

भारतीय फार्मा निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका को जाता है। वित्त वर्ष 2025 में कुल फार्मा निर्यात का लगभग 34.6 प्रतिशत अमेरिका को हुआ। भारतीय कंपनियों के पास USFDA से सबसे अधिक स्वीकृतियां भी हैं, जिससे भारत वैश्विक जेनेरिक दवा बाजार में मजबूत स्थिति बनाए हुए है। हालांकि, नई अमेरिकी नीति आने वाले वर्षों में भारतीय फार्मा उद्योग की रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर सकती है।

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