हिन्दुस्तान मिरर न्यूज़ :
दक्षिणी ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर भीषण हमले; बंदर अब्बास को मुख्य भूमि से अलग करने की कोशिश, जवाबी कार्रवाई की तैयारी में ईरान।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब नए और अधिक गंभीर चरण में पहुंच गया है। अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में कई रणनीतिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं। इन हमलों में पुल, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, पावर स्टेशन, संचार नेटवर्क और बिजली ग्रिड को निशाना बनाया गया। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह बंदर अब्बास को देश के आंतरिक हिस्सों से अलग करना और होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में उसकी सैन्य एवं रसद क्षमता को कमजोर करना है।
बताया जा रहा है कि अमेरिकी कार्रवाई के दौरान होर्मुजगान प्रांत के कई प्रमुख पुल क्षतिग्रस्त हुए, जिनमें बंदर अब्बास को लार, शिराज और आसपास के इलाकों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण पुल शामिल हैं। इसके अलावा बंदर खमीर क्षेत्र के वैकल्पिक मार्गों को भी निशाना बनाया गया, जिससे सड़क संपर्क गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
हमलों का असर केवल परिवहन व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। बंदर अब्बास रेलवे स्टेशन, चाबहार के कंट्रोल टावर, किश द्वीप के पावर स्टेशन, बुशहर के सैन्य ठिकानों और कई बिजली सब-स्टेशनों पर भी हमले किए गए। इसके बाद दक्षिणी ईरान के अनेक क्षेत्रों में लंबे समय तक बिजली आपूर्ति बाधित रही। विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली ग्रिड को नुकसान पहुंचने से रडार, कमांड सेंटर और सैन्य संचार व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
बंदर अब्बास ईरान का सबसे बड़ा समुद्री व्यापारिक केंद्र होने के साथ-साथ होर्मुज क्षेत्र में सैन्य आपूर्ति का प्रमुख आधार भी है। यहां से आवश्यक सैन्य उपकरण, ईंधन और रसद विभिन्न द्वीपों और नौसैनिक ठिकानों तक पहुंचाई जाती है। ऐसे में इस क्षेत्र को निशाना बनाकर अमेरिका ईरान की सामरिक क्षमता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी ओर, ईरान ने संकेत दिए हैं कि वह पीछे हटने के मूड में नहीं है। तेहरान का दावा है कि वह सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर जवाब देने की तैयारी कर रहा है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा, जबकि अमेरिकी पक्ष का दावा है कि उसका उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को सीमित करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि तेहरान आगे सैन्य जवाब देता है या कूटनीतिक समाधान की दिशा में कदम बढ़ाता है।














